0
वेदादि शास्त्र

हमारे ऋषि-महर्षि ज्ञान-विज्ञान के निधि हैं। लेकिन इन्होंने जितना ज्ञान पर जोर दिया उतना विज्ञान पर नहीं। इसीलिए हम विज्ञान के क्षेत्र पीछे हो गए। ज्ञान की जितनी व्याख्या हमारे ऋषियों ने की उतनी दुनियां में कहीं नहीं हुई। हमारे वेदादि शास्त्र पूरी दुनिया के संविधान हैं। इनमें जितनी उदारता, सहिष्णुता व विश्व वंधुत्व भरा है, उतनी दुनिया के किसी साहित्य में नहीं मिलेगा। इसी वेद की व्याख्या महर्षि गौतम, महर्षि कणाद, महर्षि कपिल, महर्षि पतंजलि, महर्षि जैमिनी व महर्षि व्यास ने अपने-अपने ढंग से की है। इसमें पूर्वोत्तर जो चार ऋषि हैं वे वेद की व्याख्या करते हुए वेद से विचलित होते हुए अपने मतों का प्रकाशन भी किए। वेद में अपार निष्ठा रखने वाले विद्धान उनके निजी मतों को महत्व नहीं देते हैं। वेदों की वास्तविक व्याख्या करने वाले दो ही महर्षि हुए- महर्षि जैमिनी व महर्षि व्यास। इन्होंने युक्तिपूर्वक वेदों की व्याख्या की। जैमिनी ने कर्मोपासना पर जोर दिया और व्यास ने ब्रह्म उपासना पर। फलस्वरूप पूर्व मीमांसा दर्शन एवं उत्तर मीमांसा दर्शन जैसे गहन शास्त्रों का आविष्कार हुआ। महर्षि जैमिनी ने अपने दर्शन ग्रंथ में ‘अथातो धर्म जिज्ञासा’ अर्थात् प्रत्येक विचारशील मनुष्य को धर्म के बारे में सोचना आवश्यक है, पर जोर दिया। व्यास ने ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ अर्थात प्रत्येक विचारशील मनुष्य को संसार का निर्माण करने वाले ब्रह्म को जानना चाहिए, पर जोर दिया। इन दोनों की कृति मानव मस्तिष्क के उच्च कोटि के विचार प्रस्तुत करती हैं।

सत्य आदि युगों में अविछिन्न रूप से वेदादि शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन होता था। बाद में द्वापर युग में आकर लोगों का वेदों के प्रति आकर्षण कम हुआ। व्यवहार के प्रति लोगों का झुकाव अधिक होने लगा। फलस्वरूप वेदों की गंभीरता का ज्ञान लोगों से दूर होता गया। वेदों का अध्ययन कम होने लगा तो उसका ज्ञान कैसे हो, इसलिए उस समय महर्षि व्यास ने जोर देकर कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को इतिहास एवं पुराण के द्वारा वेदों के रहस्य को जानना चाहिए। इतिहास दो प्रकार के बताए गए हैं- प्रकिया व पुराकल्प। प्रक्रिया इतिहास एक नायक वाला होता है, जैसे रामायण। पुराकल्प इतिहास अधिक नायक वाला जैसे महाभारत। इसलिए रामायण व महाभारत हम लोगों के आदर्श ग्रंथ हैं।

इतिहासपुराणाभ्यां वेदान् समुपजिम्भयेत्।

विभेत्यल्पश्रुताद् वेदोमामयप्रहरिस्यति।। अर्थात् वेद अल्पश्रुत अर्थात् कम पढ़े-लिखे लोगों से भयभीत होता है। क्योंकि वह मुझपर प्रहार करेंगे। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को वेदों का रहस्य जानने के लिए उन्हें इतिहास-पुराण का अध्ययन करने की सलाह महर्षि व्यास ने दी।

इतिहास में भौतिक जगत का सांगोपांग वर्णन होता है। पुराणों में भौतिक व आध्यात्मिक जगत दोनों की व्याख्या होती है। पुराणों में ऐसा कोई पुराण नहीं है जो व्यक्ति को मोक्ष न दिला सके। पुराणों का उद्घोष है- पुराणों की सेवा करने वाला व्यक्ति अवश्य मोक्ष का अधिकारी होता है। पुराणों में भी महापुराण 18 या 19 हैं। एक पुराण श्रीमद्भागवत महापुराण को लेकर विवाद है। भगवत्या इदं भागवत् अथवा भगवत: इदं भागवतम्। यह भगवती का पुराण है अथवा भगवान का। इसी कथन को लेकर विवाद है। देवी भागवत पुराण व श्रीमद्भागवत पुराण दोनों महापुराणों में आते हैं। पुराणों में 10 पुराण- स्कंद पुराण, शिव पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण, नारद पुराण, गरुण पुराण, अग्नि पुराण, भविष्य पुराण, लिंग पुराण व मत्स्य पुराण भगवान शंकर के महत्व को बताते हैं। चार पुराण- ब्रह्माण्ड पुराण, ब्रह्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण व ब्रहमाण्ड पुराण ब्रह्मा को सर्वोपरि मानते हैं। दो पुराण- मारकण्डेय पुराण व देवी भागवत पुराण देवी को सर्वोपरि मानते हैं। शेष दो पुराण- श्रीमद्भागवत पुराण व विष्णु पुराण भगवान विष्णु को सर्वोपरि देवता मानते हैं। स्कंद पुराण का श्लोक है-

अष्टादशपुराणेसु दशभिर्गीयते शिव:।

चतुभिर्भगवान ब्रह्मा द्वाश्यां देवी तथा हरि:।। इस तरह से पुराणों की व्याख्या हुई है। इसके अलावा वेदों के रहस्य को खोलने के ऐतिहासिक ग्रंथ रामायण व महाभारत हैं। पुराणों में महापुराण के अलावा 64 उप पुराण हैं। जिसमें साम्ब, कठिका व नृसिंह पुराण आदि आते हैं। इस प्रकार वैदिक साहित्य की व्याख्या करने में ऐतिहासिक ग्रंथों व पुराण ग्रंथों का आर्य संस्कृति में विशेष महत्व है।

इसके अतिरिक्त वेदादि शास्त्रों ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक ग्रंथ, उपनिषद आदि की प्राकारान्तर से विशेष व्याख्या हुई है जिसमें कल्प, श्रौत सूत्र, धर्म सूत्र, गृह सूत्र एवं शूल्व सूत्रों का विशेष स्थान है। इन सबमें कर्मकाण्ड में दर्शपौर्णमास, अग्निहोत्र, सोम व वाजपेय आदि यज्ञों का विस्तृत वर्णन होता है। इन ग्रंथों से वेद के द्वारा प्रतिपादित कर्मों की समुचित व्याख्या हुई है।

धर्मशास्त्र प्रत्येक विचारशील मनुष्य को समुचित आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। प्रत्येक मनुष्य इस विशाल कर्मभूमि में कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रत्येक मनुष्य अपने शरीर, वाणी, मन से कर्म करता है। कर्मों का फल भी कर्म के अनुसार शुभ-अशुभ होता है। क्योंकि मनुस्मृति ग्रंथ बताता है कि शरीर से उत्पन्न होने वाले पाप पुंजों से प्रत्येक प्राणी को स्थावर (एक ही जगह रहने वाले अर्थात लता, गुल्म, वनस्पति आदि) योनि प्राप्त होती है। स्थावर: विंशति लक्षा:। लता, गुल्म, वनस्पति के 20 लाख योनि बताए गए हैं। वाचनिक पापों से क्रीमी, कीट, पतंग, पक्षी, पशु व वानर योनि प्राप्त होने की स्थिति बताई गई है। इनकी संख्या 11 लाख बताई गई है- क्रीमय: रूद्र लक्षा:। पक्षियों की दस लाख, पशु की तीस लाख, पशव: त्रिम्सल्लक्षा:। वानर की चार लाख- वानरा: चतुर्लक्ष्या:। मानस पाप करने वाले अंत्य जाति की योनि को प्राप्त होते हैं- मानसेहिअंत्य जातिताम्। सब मिलाकर 84 लाख योनियों में मनुष्य भटकता रहता है।

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top