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ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र ने कहा कि प्रथम पूज्य आदि देव गणेश की उत्पत्ति बुधवार को हुई थी। इसलिए इस दिन व्रत रहने वाले और आदि देव की पूजा-अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं पर गणपति की विशेष कृपा बरसती है। यह व्रत संकल्प के साथ 21 या 45 बुधवार को किया जा सकता है। हर बुधवार व्रत रहने से गणेशजी की कृपा हमेशा बरसती रहती है। यह व्रत विद्या-बुद्धि प्रवर्तक तथा व्यापार में आने वाले अवरोधों को दूर करता है।


विधान
प्रात:काल उठकर नित्यक्रिया से निवृत्त होकर पूजा स्थल पर भगवान गणेश का चित्र स्थापित करें। पूरे दिन व्रत रहने का संकल्प अपनी मनोकामना के साथ करें। इसके बाद विधि-विधान से भगवान गणेश का पूजन-अर्चन करें। पूरे दिन व्रत रहें और शाम को सूर्यास्त से पूर्व पारण कर लें। भोजन में हरे मूंग की दाल, चावल की खिचड़ी, मूंग का हलवा, हरे मूंग की पकौड़ी चार या पांच ग्रास लेना चाहिए। अन्य पदार्थों का इसके बाद सेवन करें। भोजन के पूर्व 5 या 7 तुलसी पत्र, गंगाजल और तीर्थजल के सेवन का विधान है। इस व्रत में जिस चीज का सेवन किया जाता है उसे किसी अपंग या अंगहीन व्यक्ति को दान देना भी श्रेयस्कर माना जाता है। इस व्रत में हरे रंग का वस्त्र धारण करें और ऊं गं गणपते नम: तथा ऊं ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुद्धाय नम: मंत्र का मानसिक जाप करें। अंतिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के पश्चात अंगहीन अथवा भिक्षुक को कुछ दान करने का विधान है। हवन में चिड़चिड़ा का प्रयोग अवश्य करें। हवन के बाद ब्राह्मण को कांस्य पात्र, दो फल, हरी रुमाल, हरा वस्त्र व हरे मूंग इत्यादि का दान करें। हो सके तो इस दिन गणेश मंदिर में जाकर गणेशजी का विधिवत पूजन-अर्चन करना चाहिए। एक पाव मोदक का प्रसाद गणेश जी को अवश्य अर्पित करें। इस दिन गाय को हरी घास खिलाना भी उत्तम माना जाता है।

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  1. कालसर्प दोष से मुक्ति पाने के लिए एक छोटा सा चांदी का सर्प बनावाकर तुलसी में रखकर इसकी पूजा करें। https://goo.gl/s9YQ9T

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