0
कार्तिक शुक्ल् को देवोत्थान या प्रबोधनी एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि अषाढ़ शुक्ल एकादशी (हरिशयनी) एकादशी को भगवान क्षीर सागर में शयन करने के लिए चले जाते हैं और चार माह बाद देवोत्थान एकादशी के दिन जागते हैं। इन चार महीनों में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होते। देवोत्थान एकादशी के बाद विवाहादि मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है।
ज्योतिषी पं. शरदचंद्र मिश्र, के अनुसार देवोत्थान एकादशी के दिन निर्जल व्रत रह भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना करनी चाहिए और रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन करना चाहिए। समस्त तीर्थों के सेवन से जो पुण्य मिलता है, उससे कोटि गुना फल इस एकादशी के दिन अर्घ्य दान से प्राप्त होता है। जो इस दिन अगस्त्य के पुष्प से हरि का पूजन करता है उसे देव गण नमन करते हैं। जो बेल पत्रों से श्रीकृष्ण का पूजन करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। तुलसी दलों व मंजरियों से विष्णु का पूजन करने पर करोड़ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो कदम्ब के फूलों से जनार्दन का पूजन करते हैं उन्हें नरक की यातना से मुक्ति मिलती है।

key word: prabodhani ekadashi, devotthan ekadashi

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top