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ज्योतिषाचार्य पं. दयाशंकर मिश्र याज्ञिक ने कहा कि शुक्रवार मूलत: मां दुर्गा के स्वरूप संतोषी माता का दिन है। इस दिन व्रत रहने से मां प्रसन्न होती है तो दु:ख-दारिद्रय का नाश कर सुख-संपत्ति और सौभाग्य प्रदान करती है। मां उमा का ही दूसरा नाम संतोषी माता है। इस दिन महिलाएं सर्वाधिक व्रत रहती हैं। इस दिन केवल व्रती को ही नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए खट्टी चीजें खाना वर्जित हैं। इस दिन शुक्र ग्रह को मजबूत करने के लिए भी छह शुक्रवार व्रत रहना चाहिए। सातवें शुक्रवार को बांस के पात्र में शुक्र की रजतमयी प्रतिमा रखकर उसकी पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्रानादि विधि से पूजा करनी चाहिए। श्वेत वस्त्र, जनेऊ, श्वेत चंदन, अक्षत, श्वेत फूल आदि अर्पित कर मंगल कामना करनी चाहिए।

विधान
प्रात:काल उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर पूजा घर की साफ-सफाई कर लेनी चाहिए। स्रान करने के बाद पूजा घर में कलश स्थापित करना चाहिए। उसके ऊपर चने से भरा कटोरा रखें और उसके ऊपर गुड़। संतोषी माता की प्रतिमा को कलश के पूर्व में एक पाटे पर वस्त्र बिछाकर स्थापित करें। घी का दीपक जलाकर उनकी पूजा करें। हाथ में गुड़ व चना लेकर व्रत कथा का श्रवण करना चाहिए। इसके बाद हाथ में लिया हुआ गुण-चना गाय को खिलाएं, स्वयं ग्रहण करें और दूसरों में भी प्रसाद स्वरूप बांटें। कलश के जल को घर के हर कमरे में छिड़कें। उद्यापन के दिन पूजन के बाद ढाई सेर खाजा, मोमनदार पूड़ी, खीर, चने का साग अर्पित करें। आरती के बाद मां का जयकारा बोलकर नारियल फोड़ें। अपने परिवार, पड़ोस या ब्राह्मण के 8 बच्चों को भोजन कराकर मिठाई, फल व पुस्तक दक्षिणा में दें। इस व्रत में केवल मीठी चीजों का ही प्रयोग किया जाता है।

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