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पं: शरदचंद्र मिश्र के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्‍ल चतुर्थी सिद्धिविनायक चतुर्थी के रूप में जानी जाती है। इसमें किया गया दान, उपवास व पूजा-अर्चना बहुत फल देता है लेकिन इस चतुर्थी को चंद्रदर्शन का निषेध किया गया है। इसी दिन गणेशजी की उत्‍पत्ति का दिन है। जब गणेश जी पैदा हो गए तो मां पार्वती प्रहरी बनाकर उन्‍हें दरवाजे पर बैठा दीं और किसी को भी अंत:प्रवेश न करने की आज्ञा दीं। भगवान शिव के आने पर गणेश जी ने उनके साथ भी वही वर्ताव किया जो अन्‍य के साथ। फलस्‍वरूप शिवजी कुपित होकर इसी दिन उनका शिरोच्‍छेदन कर दिए। भगवान गणेश का सिर चंद्रलोक में चला गया और चंद्रलोक रक्‍तरंजित हो गया। एक अन्‍य कथा के अनुसार चंद्रमा अपनी 27 पत्नियों में केवल रोहिणी को ही प्रेम करता था। शेष 26 पत्नियों के साथ उत्‍तम व्‍यवहार नहीं करता था। नाराज होकर शेष स्त्रियां अपने पिता दक्ष के पास जाकर शिकायत कीं। दक्ष के कहने पर चंद्रमा ने उनकी बात नहीं सुनी। फलस्‍वरूप भाद्रपद मास के शुक्‍ल चतुर्थी के दिन दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को शाप दे दिया कि उसे कुष्‍ठ हो जाय। वह कुष्‍ठ रोग से ग्रसित हो गया और प्रभास क्षेत्र में तपस्‍या करने के बाद वह इस रोग से मुक्‍त हुआ। इन दोनों पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार भाद्रपद शुक्‍ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन उत्‍तम नहीं माना जाता। ऐसी मान्‍यता है कि इस चंद्र दर्शन से मिथ्‍या कलंक लगता है। 
यदि चंद्रदर्शन हो जाए तो क्‍या ?
विष्‍णु पुराण के अनुसार यदि आज के दिन प्रमादवश या भूलवश चंद्र दर्शन हो जाय तो स्‍मयंतक मणि की कथा सुननी चाहिए। कथा- श्रीक2ष्‍ण की द्वारिकापुरी में सत्रजित ने सूर्य की उपासना से सूर्य के समान प्रकाशवाली व प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण देने वाली स्‍मयंतक मणि प्राप्‍त की थी। एक बार उसे संदेह हुआ कि शायद क2ष्‍ण इसे छीन लेंगे। यह सोचकर उसने यह मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। दैववश वन में शिकार खेलने गए प्रसेन को सिंह खा गया और सिंह से वह मणि जाम्‍बवान छीन ले गए। इससे श्रीक2ष्‍ण पर यह कलंक लग गया कि मणि के लोभ से उन्‍होंने प्रसेन को मार डाला। अंतर्यामी श्रीक2ष्‍ण जाम्‍बवान की गुफा में गए और 21 दिन तक घोर युद्ध करके उनकी पुत्री जाम्‍बवती तथा स्‍मयंतक मणि को ले आए। यह देखकर सत्रजित ने वह मणि उन्‍हें अर्पित कर दी। भाद्रपद शुक्‍ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन होने पर श्रीमद़भागवत महापुराण की यह कथा अवश्‍य श्रवण करनी चाहिए।

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