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पं. शरदचंद्र मिश्र

गणेश चतुर्थी व्रत 19 सितम्बर दिन बुधवार को है।
कृत्य रत्नावली ग्रंथ के अनुसार यह व्रत भाद्रपद चतुर्थी को किया जाता है। इसी दिन मध्याह्न में गणेशजी का जन्म हुआ था। इसमें मध्याह्न व्यापिनी तिथि ली जाती है। 19 सितम्बर को सूर्योदय 5.57 बजे है और चतुर्थी तिथि का मान 46 घटी 19 पला अर्थात रात्रि 12.29 बजे तक है। भगवान गणेश विध्नहर्ता व विघ्नकर्ता दोनों हैं। जहां साधकों के लिए वह विघ्न विनाशक हैं वहीं दुष्टों के लिए विघ्नकर्ता हैं। गणेशजी बुद्धि के देवता हैं। ऋद्धि व सिद्ध की धर्मपत्नियां हैं। इस प्रकार भगवान गणेश की उपासना से जहां कार्यों में सफलता मिलती है, अवरोध हटते हैं, वहीं ज्ञान व बुद्धि में वृद्धि होती है तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा पर सिन्दूर चढ़ाना चाहिए और उन्हें लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए।
विधान
इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर अपनी शक्ति के अनुसार सोने, चांदी, तांबे, पीतल, मिट्टी या गोबर से गणेशजी की प्रतिमा बनाएं अथवा बनी हुई प्रतिमा का पुराणों में वर्णित गणेशजी के गजानन, लम्बोदर स्वरूप का ध्यान करते हुए संकल्प लें-
मम् सर्व संकट निवारणार्थ चतुर्थी व्रतॉगत्वेन गणपति देवस्य पूजन करिष्ये।
पूजा के अवसर पर 21 दूर्बा दल (दूब) भी रखें और उनमें से निम्नलिखित दस नामों का नाम लेते हुए दो-दो दूर्वा दल एक-एक नाम पर चढ़ाएं।
1- ऊं गणाधिपाय नम:। 2- ऊं उमापुत्राय नम:। 3- ऊं विघ्ननाशनाय नम:। 4- ऊं विनायकाय नम:। 5- ऊं ईशपुत्राय नम:। 6- ऊं सर्वसिद्धिप्रदाय नम:। 7- ऊं एकदंताय नम:। 8- ऊं इभवक्त्राय नम:। 9- ऊं मूषकवाहनाय नम:। 10- ऊं कुमारगुरुवे नम:।
इसके बाद इन दसों नामों का एक साथ उच्चारण कर शेष बची एक दूर्वा चढ़ाएं। इसी प्रकार इक्कीस मोदक का भी भोग लगाएं। पांच मोदक मूर्ति के पास चढ़ाएं, पांच ब्राह्माण या सत्पात्र को दें, शेष को प्रसाद स्वयं लें और परिजनों, शुभचिंतकों में बांटें। पूजन की यह विधि मध्याह्न में करें। व्रत महात्म्य का श्रवण करें और सामग्री दान करते समय कहें-
दानेननिन देवेश प्रीतो भव गणेश्वर। सर्वत्र सर्वदा देव निर्विघ्नं कुरु सर्वदा। मानोन्नतिं च राज्यं च पुत्रपौत्रान प्रदेहि मे।।
इस दिन गणेश सहस्र नामावली से 1000 नामों से प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ मोदक, दूर्वा दल व दक्षिणा अर्पित करने का विधान भी है।
महात्म्य

कृत्य रत्नावली में वर्णन है कि एक बार माता पार्वती भी भगवान शिव से नाराज हो गर्इं। इस पर भगवान शिव ने भी 21 दिनों तक अनादि भगवान गणेश का व्रत किया और पूजा की। उनकी साधना के प्रभाव से पार्वती जी के मन में पुन: भगवान शिव के प्रति प्रेम भाव जाग्रत हो गया। पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि आपने ऐसा कौन सा उपाय किया कि मैं आपके पास भागी भागी आ गई। भगवान शिव ने कहा- हे देवी तुम्हें प्रसन्न करने के लिए मैंने गणेश व्रत किया। इसके पश्चात पार्वती जी ने भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की आकांक्षा से 21 दिनों तक गणेश व्रत किया। फलस्वरूप कार्तिकेय जी स्वयं पार्वती जी से आ मिले। कार्तिकेय जी से श्रवण कर यह व्रत विश्वामित्र ने भी किया और ब्रह्मऋषि बने।


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