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पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करने का पक्ष पितृ पक्ष 29 सितम्बर से शुरू हो रहा है। पितृ विसर्जन 15 अक्टूबर को होगा। इस 17 दिन के पक्ष में पितरों को संतुष्ट करने के उद्देश्य से श्राद्ध किया जाता है। इससे पितृगण वर्ष भर तक प्रसन्न रहते हैं और उनकी प्रसन्नता से आशीर्वाद निकलता है जो हमें सुख-समृद्धि देने के साथ ही दीर्घायु बनाता है।
यह बातें ज्योतिषाचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र ने कही। उन्होंने कहा कि श्राद्ध का अधिकार केवल पुत्र को है। यदि पुत्र नहीं है तो पुत्री का पुत्र, यदि वह भी नहीं है तो परिवार का कोई भी उत्तराधिकारी श्राद्ध कर सकता है। जिस पिता के अनेक पुत्र हों तो ज्येष्ठ पुत्र को श्राद्ध करना चाहिए। पुत्र के अभाव में पौत्र, पौत्र के अभाव में प्रपौत्र तथा किसी के न रहने पर भाई की संतान भी श्राद्ध कर सकती है। पुत्र के अभाव में मृतक की पत्नी भी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी का श्राद्ध पति तभी कर सकता है जब उसे कोई पुत्र न हो। शास्त्रों में कहा गया है- तीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्र: कुतपस्तिला:। अर्थात् पुत्री का पुत्र, मध्याह्न का समय और तिल ये तीन श्राद्ध में अत्यंत पवित्र हैं। ‘यदन्नं पुरुषोऽश्नति तदन्नं पितृदेवता:। अपक्वेनाथ पक्वेन तृप्ति कुर्यात् सुत: पितु:।।’ अर्थात् मनुष्य जिस अन्न का स्वयं भोजन करता है उसी अन्न से पितर व देवता तृप्त होते हैं। पकाया हुआ अथवा बिना पकाया हुआ अन्न प्रदान करके पुत्रों को अपने पितरों को तृप्त करना चाहिए। श्राद्ध में सदाचारी व वेदपाठी ब्राह्मण को भोजन कराने का बहुत महत्व है। कम से कम एक ब्राह्मण को अवश्य भोजन कराना चाहिए। साथ ही गाय, कुत्तों व कौओं को भी अन्न प्रदान करना चाहिए।

वर्जना
श्राद्ध करने वालों को पंद्रह दिन तक क्षौर कर्म नहीं करना चाहिए तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। प्रतिदिन तर्पण करके ही कुछ खाना-पीना चाहिए। तेल-उबटन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। श्राद्ध में क्रोध, असत्य संभाषण, कुत्ते का स्पर्श व अश्रुपात निषिद्ध माना गया है।

वर्जित पुष्प
श्राद्ध में विल्पपत्र, मालती, चम्पा, नागकेशर, कर्ण, जवा, कनेर, केतकी व समस्त रक्त पुष्प वर्जित हैं। केवल श्वेत पुष्प ही श्राद्ध में प्रयोग करना चाहिए।


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