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सावधान: वास्तु की गड़बड़ी मंगवा सकती है भीख

किसी भी भवन में वास्तु की गड़बड़ी किस हद तक भवन मालिक और उसके परिवार को परेशान कर सकती है। किस तरह के प्लाट पर भवन‍ निर्माण शुभकारी होता है तथा किस तरह के प्लाट पर अशुभकारी। भवन निर्माण में वास्तु का क्या महत्व है। उसके वैज्ञानिक कारण क्या हैं, आदि जरूरी बिन्दुओं पर फोकस कर रहे वरिष्ठ वास्तुशास्त्री डॉ. मनोज सिंह ‘आयुष’।

किसी भी भवन में वास्तु के महत्व को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। भवन में यदि वास्तु की भारी गड़बड़ी है तो वह निहायत ही आर्थिक रूप से कमजोर, रोगी और नाना प्रकार की परेशानियों में डालते हुए भवन मालिक से भीख तक मंगवा सकती है। खासतौर से पूरब और उत्तर पतला तथा पश्चिम व दक्षिण चौड़ा प्लाट इसका कारक बनता है। वास्तुशास्त्रीय मान्यताओं पर दृष्टि डालें तो राजा हरिश्चंद्र के भवन का विस्तार भी दक्षिण की तरफ ज्यादा था और उत्तर की तरफ पतला। जो उन्हें स्वयं को बेचने पर मजबूर कर दिया था।

वास्तु का महत्व

शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार हर भवन में एक वास्तु देवता होते हैं। यदि उनके अनुकूल अर्थात वास्तु के अनुकूल भवन निर्माण नहीं कराया गया तो वास्तु देवता को देवताओं द्वारा यह वरदान मिला है कि उस भवन में रहने वाले प्राणियों को अपना ग्रास बना लें। भवन निर्माण वास्तु के अनुकूल होने पर वास्तु देवता उस भवन के यश व प्रसिद्धि में वृद्धि करते हैं। वैज्ञानिक महत्व यह है कि यदि भवन सही दिशा में व वास्तु के अनुकूल बना है तो जीवनदायिनी ऊर्जा से लबरेज रहता है।



अशुभ प्लाट

यदि प्लाट जिस पर भवन निर्माण करना है वह पश्चिम चौड़ा पूरब पलता और दक्षिण चौड़ा उत्तर पतला है तो वह भवन मालिक को नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त करते हुए अंतत: उसे भीख मांगने तक पर मजबूर कर सकता है। इस तरह के प्लाट शेरमुखी हों या गोमुखी, पूर्णत: दोषपूर्ण होते हैं। आम भ्रांति यह है कि गोमुखी प्लाट शुभ होता है लेकिन यह धारणा पूर्णत: गलत है। इस तरह का प्लाट नाना प्रकार के रोग, पुत्र हानि, घर के मालिक व मालकिन की हानि, अपयश और अंततोगत्वा आत्महत्या का कारक बनता है। यदि इस तरह के प्लाट पर पूरब और उत्तर मुख्य द्वार कर दें तो सिर्फ इतना ही अंतर आयेगा कि बर्बादी में थोड़ा टाइम लगेगा।

शुभ प्लाट

पूरब-उत्तर कार्नर का प्लाट सबसे अच्छा होता है। यह आयताकार हो या वर्गाकार दोनों शुभ हैं। आड़े-तिरछे प्लाट बहुत शुभ नहीं माने गये हैं लेकिन यदि पश्चिम पतला है और पूरब चौड़ा तथा दक्षिण पतला है और उत्तर चौड़ा और इनका मुख्य द्वार पूरब या उत्तर हो तो भी ये प्लाट ठीक माने गये हैं। इस तरह के प्लाट धन, संपत्ति, ऐश्वर्य, यश, स्वास्थ्य व प्रसिद्धि में लगातार वृद्धि कराते हैं।

वास्तुशास्त्र सम्मत वैज्ञानिक आधार

सूर्य पूरब की तरफ से उदय होते हैं। उदय के तीन घंटे बाद तक सूर्य से जीवनदायिनी ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है। प्लाट पूरब पतला हो तो जीवन दायिनी ऊर्जा भवन में बहुत कम प्रवेश करती है। इसके बाद सूर्य दक्षिणायन होते हैं तो सूर्य की किरणों में अतिउष्मीय शक्ति बढ़ जाती है और उसके बाद के तीन घंटे तक सूर्य की किरणों में अल्ट्रावायलेट रेज अपने प्रचण्ड वेग में होती है, इस समय सूर्य दक्षिण और पश्चिम में होते हैं, चूंकि दक्षिण और पश्चिम दोनों तरफ प्लाट का विस्तार ज्यादा होने से अल्ट्रावायलेट रेज भवन में भारी मात्रा में प्रवेश करती और भवन की शुभ ऊर्जा अर्थात सुबह के समय में थोड़ी सी प्रवेश की जीवनदायिनी ऊर्जा को पूरी तरह डिस्टर्ब कर देती है। भवन से शुभ ऊर्जा के समाप्त होने पर तरह-तरह की समस्याएं पैदा हो जाती है।

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