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कर्मकाण्ड व उसका महत्व

वेद आर्य जाति का ही नहीं समस्त मानव जाति का सर्वोच्च साहित्य है। इसमें सवा लाख मंत्रों की व्याख्या हुई है जिसमें 80 हजार मंत्र केवल कर्मकाण्ड पर जोर देते हैं। तीस हजार मंत्र उपासना- भक्ति पर जोर देते हैं। 20 हजार मंत्र ज्ञान पर जोर देते हैं। कर्मों की व्याख्या करने वाले 80 हजार मंत्र वैदिक कर्मों पर विशेष बल देते हैं। उनका यह कथन है कि शुभ कर्म किए बिना मनुष्य सुखी नहीं रह सकता। अत: वेद के कर्मकाण्ड के द्वारा बनाए गए शुभ कर्मों का अनुसरण करना परम आवश्यक है। ये सभी मंत्र 33 कोटि देवताओं के संबंध में आए हैं। कोई ऐसा देवता नहीं है जो उपासना करने पर उपासक को निराश करे। अत: वेद के प्रत्येक मंत्र अर्थचिंतन के साथ देवताओं का आवाहन, प्रतिष्ठापन, पूजन, समाराधन पर विशेष जोर देते हैं। निष्ठा पूर्वक कर्म करने वाले प्रत्येक यजमान अवश्य फलभागी होते हैं। कर्म में संबंधित ब्राह्मण देवताओं को भी नियमित रूप से कर्म का अनुष्ठान करना अति आवश्यक है। तभी इष्ट फल प्राप्त हो सकते हैं। मनुष्य की इच्छाएं अनंत हैं। उन अनंत इच्छाओं की प्राप्ति के लिए कर्मकाण्ड अपनी शक्ति लगाता है। कर्मों में लघुरूद्री, महारूद्र, अतिरूद्र, मंदिर प्रतिष्ठा, देवताओं की प्रतिष्ठा, भावनाओं का केन्द्रीयकरण, शतचण्डी, सहस्रचण्डी, लक्षचण्डी, विष्णु महायज्ञ, नारायण महायज्ञ, हनुमान महायज्ञ आदि वैयक्तिक एवं सामाजिक कार्यों को संपादित कर परिवार एवं समाज को सुखी रखा जा सकता है।

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