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मेरी पुकार मुझ तक लौट के आ जाए, इसलिए मंदिर का गुंबद निर्मित किया गया
जैसे कि इस मुल्क में मंदिर बने। और कोई तीन चार तरह के मंदिर खास तरह के मंदिर हैं जिनके रूप में फिर सारे मंदिर बने। इस मुल्क में जो मंदिर बने वे आकाश कि आकृति में हैं जो गुंबद है मंदिर का वह आकाश कि आकृति में है। और प्रयोजन यह है कि अगर आकाश के नीचे बैठ कर मैं ओम का उच्चार करूं तो मेरा उच्चार खो जायेगा, मेरी शक्ति बहुत कम है, विराट आकाश है चारों तरफ। मेरा उच्चार लौट कर मुझ पर नहीं बरस सकेगा, खो जायेगा। मैं जो पुकार करूंगा, वह पुकार मुझ तक लौट के नहीं आएगी, वह अनंत में खो जाएगी। मेरी पुकार मुझ तक लौट के आ जाए, इसलिए मंदिर का गुंबद निर्मित किया गया। वह आकाश छोटी प्रतिकृति है, ठीक अर्ध गोलाकार, जैसा आकाश पृथ्वी को चारों तरफ छूता है ऐसा एक छोटा आकाश निर्मित किया है। उसके नीचे मैं जो भी पुकार करूंगा, मंत्रोच्चार करूंगा, ध्वनि करूंगा, वह सीधी आकाश में खो नहीं जाएगी। गोल गुंबद उसे वापस लौटा देगा। जितना गोल गुंबद, उतनी सरलता से वह वापस लौट आएगी -उतनी ही सरलता से। और उतनी ही ज्यादा प्रतिध्वनियां उसकी पैदा होंगी। अगर ठीक व्यवस्था से गुंबद मंदिर का बना हो। और फिर तो ऐसे पत्थर भी खोज लिए गए जो ध्वनियों को वापस लौटने में बड़े सक्षम हैं।

जैसे कि अजंता का एक बौद्ध चैत्य है। उसमे लगे पत्थर ठीक उतनी ही ध्वनि को तीव्रता से लौटाते हैं, उतनी ही चोट को प्रतिध्वनि करते हैं, जैसे तबला। जैसे आप तबले पर चोट कर दें, ऐसा पत्थर पर चोट करें तो इतनी आवाज होगी। अब वह बहुत विशेष मंत्रो को, जो बहुत सूक्ष्म हैं, साधारण गुंबद नहीं लौटा पाएगा, उसके लिए उन पत्थरों का उपयोग किया गया है।

क्या प्रयोजन है? जब आप ओम का उच्चार करते हैं-और सारे गुंबद के नीचे ओम का उच्चार हुआ है, वह ओम के उच्चार के लिए ही निर्मित किया गया है-जब सघनता से, बहुत तीव्रता से आप ओम का उच्चार करते हैं, और मंदिर का गुंबद सारे उच्चार को वापस आप पर फेंक देता है, तो एक वर्तुल निर्मित होता है, एक सर्किल निर्मित होता है। उच्चार का, ध्वनि का, लौटती ध्वनि का एक सर्किल निर्मित हो जाता है। मंदिर का गुंबद आपकी गूंजी हुई ध्वनि को आप तक लौटा कर एक वर्तुल निर्मित करवा देता हैं। उस वर्तुल का आनंद ही अद्भुत है।

अगर आप खुले आकाश के नीचे ओम का उच्चार करेंगे, वह वर्तुल निर्मित नहीं होगा और आपको कभी आनंद का पता नहीं चलेगा। वह जब वर्तुल निर्मित होता है तभी आप, तब आप सिर्फ पुकारने वाले नहीं हैं, पाने वाले भी हो जाते हैं। और उस लौटती हुई ध्वनि के साथ दिव्यता कि प्रतीति प्रवेश करने लगती है। आपकी की हुई ध्वनि तो मनुष्य की है, लेकिन जैसे ही वह लौटती है, वह नये वेग और नई शक्तियों को समाहित करके वापस लौट आती है।

इस मंदिर को, इस मंदिर के गुंबद को मंत्र के द्वारा ध्वनि-वर्तुल निर्मित करने के लिए प्रयोग किया गया था। और अगर बिलकुल शांत, एकांत स्थिति में आप बैठ कर उच्चार करते हों और वर्तुल निर्मित हो, तो जैसे ही वर्तुल निर्मित होगा, विचार बंद हो जाएंगे। वर्तुल इधर निर्मित हुआ, उधर विचार बंद।

जैसा कि मैंने कई बार कहा है, स्त्री पुरुष के संभोग में वर्तुल निर्मित हो जाता है शक्ति का। और जब वर्तुल निर्मित होता है तभी संभोग का क्षण समाधि का इशारा करता है। अगर पद्मासन या सिद्धासन में बैठे बुद्ध और महावीर कि मूर्तियां देखें तो वे भी वर्तुल ही निर्मित करने के अलग ढंग हैं। जब दोनों पैर जोड़ लिए जाते हैं और दोनों हाथ पैरों के ऊपर रख दिए जाते हैं तो पूरा शरीर वर्तुल का काम करने लगता है। खुद के शरीर कि विद्युत फिर कहीं बाहर नहीं निकलती पूरी वर्तुलाकार घूमने लगती है। एक सर्किट निर्मित होता है। और जैसे ही सर्किट निर्मित हो जाता है वैसे ही विचार शून्य हो जातें हैं। अगर विद्युत कि भाषा में कहें तो आपके भीतर विचारों का जो कोलाहल है वह आपकी ऊर्जा के वर्तुल न बनने कि वजह से हैं। वह वर्तुल बना कि ऊर्जा समाहित और शांत होने लगती है।

तो मंदिर के गुंबद से वर्तुल बनाने कि बड़ी अद्भुत प्रक्रिया है और अंतरंग अर्थ उसके हो गए।
-ओशो
‘गहरे पानी पैठ’ पुस्तक के
प्रवचन माला 1 से संकलित एक अंश
पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है
oshoworld.com


keyword: mandir, hindu

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  1. bahut acchi jankari se parpurn lekh hai... thanks

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