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जीवन का पूरा खेल मुक्तिपथ (श्मशान) बड़हलगंज पर एक साथ दिखता है। एक तरफ उड़ती है मरघट्टी दुर्गंध और दूसरी तरफ तरफ विहंसता है जीवन। वातावरण में गूंज रहे जलते हुए शव के धुएं जीवन की निस्सारता का बोध कराते हैं तो मुंडन, उपनयन व विवाह संस्कार, वर देखाई व मंगनी जीवन के प्रति आकर्षण पैदा करती है। संसार से विरक्ति और आसक्ति दोनों एक साथ उपस्थित है यहां। यहां लोग पिकनिक भी मनाने आते हैं। एक तरफ लाइन से शव जलते रहते हैं तो दूसरी तरफ सुबह से लेकर शाम तक उत्सव व उल्लास का माहौल दिखता है।

मुक्ति पथ जहां कभी केवल मरघट्टी दुर्गंध उड़ती थी आज वहां जीवन का उल्लास दिखता है। यह संभव हो सका पिछले दो बार से चिल्लूपार के विधायक चुने जा रहे राजेश त्रिपाठी के प्रयासों से। मुक्तिपथ के निर्माण में वैसे तो क्षेत्रीय जनता का पर्याप्त सहयोग रहा लेकिन पहल राजेश त्रिपाठी ने की थी। उन्होंने गांव-गांव, गली-गली घूमकर लोगों से अपील की और एक-एक रुपया चंदा इकट्ठा किया। जिसने एक रुपया दिया उसका भी और जिसने एक हजार दिया उसका भी श्री त्रिपाठी ने तहे दिन शुक्रिया अदा किया और इस पुण्य कार्य में उनके महती सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया। उनके विधायक चुने जाने के पीछे भी मुक्ति पथ का निर्माण ही मुख्य भूमिका में था। पहले वहां चारो तरफ गंदगी बिखरी रहती थी। शव जलाने के जाने वालों को न तो बैठने का कोई स्थान था न ही छाया। राजेश की पहल पर आज वह एक पिकनिक स्पॉट के रूप में विकसित हो चुका है। करीब ढ़ाई एकड़ में निर्मित मुक्तिपथ पर एक बड़ा व सुसज्जित पार्क है जहां श्मशानवासी महाऔघड़दानी भगवान शिव की भव्य मूर्ति निर्मित है। मूर्ति के नीचे एक संकरी गुफा भी बनाई गई है। मूर्ति के सामने पार्क के पश्चिम तरफ एक बड़ा हाल है जहां लोग शोक सभा या बैठक करते हैं। यहां समय-समय पर प्रदर्शनी भी लगती है। नदी तट पर 25 चबूतरे शव जलाने के लिए बनाए गए हैं। पार्क नदी तट से काफी ऊंचा बनाया गया है। ऊंचे स्थान पर भी छह चबूतरे शव जलाने के लिए बने हैं ताकि बाढ़ के समय शव जलाने में कोई दिक्कत न हो। पूरा ढ़ाई एकड़ का मुक्तिपथ हरे-भरे वृक्षों से भरा है। विविध तरह के फूल वहां की शोभा बढ़ाते हैं। रंग-बिरंगे वस्त्रों में सुसज्जित लोग वहां घूमने जाते हैं। भीषण गर्मी की दोपहरी में भी वहां पेड़ों की छाया में लोग बैठे मिल जाएंगे। इसी वर्ष वहां एक दहेज रहित शादी हुई। पिछले तीन साल से वहां तीन दिवसीय सरयू महोत्सव आयोजित किया जाता रहा। जिसमें देश के कोने-कोने से आए कलाकार अपनी क्षेत्रीय लोक प्रस्तुतियों से इस सरयू क्षेत्र को परिचित कराते रहे। किसी कारणवश पिछले वर्ष यह आयोजन नहीं हो सका।

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