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ओशो कहते हैं कि आज का मनुष्य जितना अशांत है उतना शायद पहले कभी नहीं था। इसलिए आज मनुष्य को ध्यान की जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं थी। जो ध्यान विधियां प्राचीन काल में विकसित की गई थीं, जिस मनुष्य के लिए की गई थीं, वह मनुष्य आज नहीं है। मनुष्य के चित्त का काफी विकास हो चुका है। परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए नए मनुष्य को नए ध्यान की आवश्यकता है। ओशो रचित ध्यान विधियां पूर्णत: वैज्ञानिक हैं, ध्यान करो और परिणाम पाओ। इसके लिए किसी भी जाति, धर्म या संप्रदाय को छोड़ने की जरूरत नहीं है। ओशो को गुरु मानना भी अनिवार्य नहीं है तथा ना ही विधि को गुरु मंत्र की तरह गुप्त रखने की आवश्यकता है।
हम मन:स्थिति बदल सकते हैं परन्तु परिस्थितियां बदलना वश में नहीं है। परिस्थितियों के प्रति सोच का ढंग यानि मन:स्थिति बदलने में यह ध्यान विधियां कारगर साबित हुई हैं। इन विधियों को धैर्य पूर्वक निरंतर करते हुए अशांत मन को शांत कर सकते हैं। मानसिक तनाव व तनावजन्य रोगों से मुक्त हो आनंदमय जीवन जी सकते हैं। एकाग्रता वाली विधियां जैसे त्राटक ध्यान आदि को नकारते हुए ओशो ने मन व शरीर के माध्यम से रेचन करने वाली विधियों पर ज्यादा जोर दिया है। क्योंकि रेचन प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद मनुष्य हल्का हो जाता है। शांत तथा मौन बैठना सहज हो जाता है।
इसलिए ओशो ने मूल रूप से दो तरह की विधियां निर्मित की हैं- सक्रिय व अक्रिय। सक्रिय विधियां वे हैं जिनमें रेचन की प्रक्रिया शामिल है जैसे- डायनेमिक मेडिटेशन, कुण्डलिनी ध्यान, कीर्तन ध्यान, नादब्रह्म ध्यान आदि। अक्रिय विधियों में शांत व मौन होकर बैठ जाना है सिर्फ देखना शेष रह जाता है साक्षी भाव से, इस तरह की ध्यान विधियों में मुख्य है भगवान बुद्ध की विपश्यान ध्यान विधि।

सरल ध्‍यान विधियां से साभार

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