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ओशो कहते हैं कि जब भी मृत्यु का स्मरण आए, कोई भी मौका आए, उससे कुछ न कुछ अनुभव लें। इसके लिए उन्होंने पांच-पांच मिनट के तीन प्रयोग बताए हैं। आप कल्पना के सहारे उन्हें करते रहें, कुछ ही दिन में आप दूसरे व्यक्ति हो जाएंगे। प्रयोग खतरनाक प्रतीत हो सकते हैं परन्तु भय न लें और प्रयोग जारी रखें।
पहला प्रयोग: बहना (5 मिनट)- तैरना व बहना दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। तैरना यानी पानी के साथ संघर्ष करना, बहना यानी पानी के प्रति समर्पण भाव। संघर्ष अहंकार की भाषा है। समर्पण यानी निरहंकार। लेट जाएं, आंखें बंद कर लें और कल्पना करें कि आप तेज बहाव के साथ बहती नदी के किनारे खड़े हैं, पत्ते, लकड़ी बहे जा रहे हैं। आप भी बहती हुई नदी में उतर गए और बहे जा रहे हैं। नदी भागी जा रही है, आप भी लाश की भांति बहे जा रहे हैं। बह रहे हैं अनुभव करते रहें, हाथ पैर नहीं चलाने हैं, सिर्फ बहना है। कुछ करना नहीं है केवल शरीर को बहने दें। हम केवल बह रहे हैं। सूखे पत्ते की भांति, सूखी लकड़ी की भांति। नदी हमें लिए जा रही है, ठीक से देख लें, अनुभव में ले लें।
दूसरा प्रयोग: मिटना (5 मिनट)- एक व्यक्ति चला जा रहा है, चाल में अहंकार झलकता है। एक व्यक्ति प्रसादपूर्ण चल रहा है। एक व्यक्ति सोचता हुआ, विचार करता हुआ जा रहा है, एक व्यक्ति अपने से बातें करता हुआ जा रहा है। वह हम उसकी चाल से, मुद्रा से पहचान सकते हैं। ऐसा व्यक्ति यदि मर जाए तो हम लाश को पहचान सकते हैं कि कैसा व्यक्ति था। केवल प्रसादपूर्ण व्यक्ति का चेहरा ही इन सब से भिन्न होगा। मिटना अर्थात मर जाना अहंकार का विसर्जन, अपने को खो देना, ऐसा व्यक्ति ही प्रसादपूर्ण हो सकता है। पहला प्रयोग था आप बह रहे हैं, लाश की भांति, अब अनुभव करना है जल रहे हैं चिता पर लाश की भांति।
आंख बंद कर लेट जाएं और कल्पना करें कि श्मशान में किसी की चिता जलते हुए देख रहे हैं। पहचानें वह लाश आपकी तो नहीं है। आप ही की है। आप चिता पर चढ़े, आपके दोस्त, मित्र, रिश्तेदार आपके चारो ओर खड़े हैं। आप चिता पर अपनी लाश को जलते हुए देख रहे हैं। चिता की अग्नि की लपटें आकाश की तरफ उठती हैं और खो जाती हैं। लकड़ियों के साथ आप भी जल रहे हैं। आपका अहंकार जल रहा है। आपकी वासनाएं जल रही हैं। आपको कुछ नहीं करना है और न कर ही सकते हैं। आप जल रहे हैं, उठ नहीं सकते, पांच मिनट तक कल्पना करें कि चिता पर आपकी लाश जल रही है, लपटें भागी जा रही हैं, सब समाप्त हो रहा है। हवाएं लपटों को बढ़ा रही हैं। मित्र, रिश्तेदार विदा हो गए हैं, लाश राख का एक ढेर होकर रह गई है। ठीक से देख लें, अनुभव कर लें कि राख ही पड़ी रह गई है।
तीसरा प्रयोग: तथाता (5 मिनट)-
हमें क्रोध क्यों आता है? जब चीजें हमारे अनुकूल नहीं होतीं। जैसा हम चाहते थे वैसे नहीं होतीं। पत्नी हमारे अनुसार नहीं करती, बेटा-बेटी हमारा कहना नहीं मानते, दफ्तर में कोई हमारी नहीं सुनता। पिछले दो प्रयोगों में आपने अनुभव किया कि मेरी लाश नदी में बह रही है, मेरी लाश चिता पर जल रही है। इन्हीं दो प्रयोगों को ध्यान में रखते हुए अनुभव करें कि घर पर आंख बंद कर लेटे हुए हैं। पांच मिनट तक यह प्रयोग करें। आपके बच्चे चिल्ला रहे हैं, पत्नी भी लड़-झगड़ रही है, बाहर वाहनों का शोर भी है। कुत्ते भौंक रहे हैं, टीवी-रेडियो तेज आवाज में चल रहा है। आपका प्रिय मित्र आपसे मिलने आया है। परन्तु आप आंख बंद कर लेटे रहे, आप मर गए हैं, राख के ढेर हो गए हैं तो कोई प्रतिक्रिया कैसे कर सकते हैं। कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी है, जो हो रहा है सब स्वीकार है। जो भी हो रहा है उससे हम राजी हैं। आसपास जो भी घटित हो रहा है उसे बदलने का कोई भाव मन में न उठे।
तीनों प्रयोग एक साथ करें, पंद्रह मिनट के इस प्रयोग का चाहें तो समय बढ़ा सकते हैं, यदि नहीं भी बढ़ाएं और करते रहे तो तीन महीने में आपके भीतर एक विधायक परिवर्तन आना शुरू हो जाएगा।

सरल ध्‍यान विधियां से साभार

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