0
पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करने का पक्ष है पितृ पक्ष। 15 दिन के पक्ष में पितरों को संतुष्ट करने के उद्देश्य से श्राद्ध किया जाता है। इससे पितृगण वर्ष भर तक प्रसन्न रहते हैं और उनकी प्रसन्नता से आशीर्वाद निकलता है जो हमें सुख-समृद्धि देने के साथ ही दीर्घायु बनाता है।

यह बातें ज्योतिषाचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र ने कही। उन्होंने कहा कि श्राद्ध का अधिकार केवल पुत्र को है। यदि पुत्र नहीं है तो पुत्री का पुत्र, यदि वह भी नहीं है तो परिवार का कोई भी उत्तराधिकारी श्राद्ध कर सकता है। जिस पिता के अनेक पुत्र हों तो ज्येष्ठ पुत्र को श्राद्ध करना चाहिए। पुत्र के अभाव में पौत्र, पौत्र के अभाव में प्रपौत्र तथा किसी के न रहने पर भाई की संतान भी श्राद्ध कर सकती है। पुत्र के अभाव में मृतक की पत्नी भी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी का श्राद्ध पति तभी कर सकता है जब उसे कोई पुत्र न हो। शास्त्रों में कहा गया है- तीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्र: कुतपस्तिला:। अर्थात् पुत्री का पुत्र, मध्याह्न का समय और तिल ये तीन श्राद्ध में अत्यंत पवित्र हैं। ‘यदन्नं पुरुषोऽश्नति तदन्नं पितृदेवता:। अपक्वेनाथ पक्वेन तृप्ति कुर्यात् सुत: पितु:।। अर्थात् मनुष्य जिस अन्न का स्वयं भोजन करता है उसी अन्न से पितर व देवता तृप्त होते हैं। पकाया हुआ अथवा बिना पकाया हुआ अन्न प्रदान करके पुत्रों को अपने पितरों को तृप्त करना चाहिए। श्राद्ध में सदाचारी व वेदपाठी ब्राह्मण को भोजन कराने का बहुत महत्व है। कम से कम एक ब्राह्मण को अवश्य भोजन कराना चाहिए। साथ ही गाय, कुत्तों व कौओं को भी अन्न प्रदान करना चाहिए।

2.वर्जना

श्राद्ध करने वालों को पंद्रह दिन तक क्षौर कर्म नहीं करना चाहिए तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। प्रतिदिन तर्पण करके ही कुछ खाना-पीना चाहिए। तेल-उबटन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। श्राद्ध में क्रोध, असत्य संभाषण, कुत्ते का स्पर्श व अश्रुपात निषिद्ध माना गया है।

3.वर्जित पुष्प

श्राद्ध में विल्पपत्र, मालती, चम्पा, नागकेशर, कर्ण, जवा, कनेर, केतकी व समस्त रक्त पुष्प वर्जित हैं। केवल श्वेत पुष्प ही श्राद्ध में प्रयोग करना चाहिए।

4.श्राद्ध के 96 अवसर बताता है भविष्य पुराण

पितृपक्ष पितरों के लिए खास समय है। इस पक्ष में विधि-विधान से श्राद्ध करके पितरों को संतुष्ट किया जाता है। हालांकि भविष्य पुराण श्राद्ध के 96 अवसर बताता है। श्राद्ध में विधान कम श्रद्धा अधिक महत्वपूर्ण है। श्रद्धा से यदि सूर्योदय के समय नहा-धोकर काले तिल के साथ सूर्य को जल दें अथवा गीता के सातवें अध्याय का संकल्प सहित पाठ कर उसके पुण्य को पितरों को अर्पित कर दें तो भी पितर संतुष्ट हो जाते हैं और धन-धान्य, यश-कीर्ति, पुत्र-पौत्रादि में वृद्धि करते हैं।

ज्योतिषाचार्य पं. शरद चंद्र मिश्र ने कहा कि भविष्य पुराण में कहा गया है- ‘अमायुग्मनु क्रान्ति धृति पात महालया:। अष्टकाऽन्वष्टका पूर्वेद्यु: श्राद्धैर्नवतिश्च षट्’।। अर्थात् 12 माह की अमावस्याएं, 4 युगादि तिथियां, मनुओं के आरंभ की 14 मन्वादि तिथियां, 12 संक्रांतियां, 12 वैधृति योग, 12 व्यपाति योग, 15 महालय श्राद्ध, 5 अष्टका, 5 अन्वष्टका तथा 5 पूर्वेद्यु, ये श्राद्ध के 96 अवसर हैं।

इसके अलावा पितृपक्ष की प्रत्येक तिथि श्राद्ध के लिए पवित्र है लेकिन उसमें भी कुछ तिथियां विशेष महत्वपूर्ण हैं- चौथ कल्याणी या चौथ भरणी, कल्याणी पंचमी या भरणी पंचमी, मातृ नवमी, घात चतुर्दशी, सर्व पौत्री अमावस्या व मातामह प्रतिपदा।

मातृ नवमी दिन पुत्र अपनी मृत माता आदि के मातृपार्वण (अन्वष्टका श्राद्ध) करते हैं। पिता के जीवित रहने पर भी पुत्र अपनी मृत माता इत्यादि के निमित्त पितृपक्ष में माता की तिथि या मातृ नवमी के दिन श्राद्ध कर सकता है। घात चतुर्दशी युद्ध या किसी तरह मारे गये व्यक्तियों का श्राद्ध इस तिथि पर किया जाता है। इस श्राद्ध में आम, अनार, बिजौरा, आंवला, खीर, खजूर आदि का प्रयोग भोज में किया जाता है। सर्वपौत्री अमावस्या अर्थात् पितृ विसर्जन इसे महालया भी कहते हैं। जो व्यक्ति पितृ पक्ष के 14 दिनों तक श्राद्ध तर्पण आदि नहीं करते हैं वे अमावस्या के दिन कर सकते हैं। जिन पितरों की तिथि याद न हो उनके लिए भी इस तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। अमावस्या के दिन पितर अपने पुत्रादि के द्वार पर पिण्डदान व श्रद्धादि की आशा में आते और संतुष्ट होकर पितृलोक की ओर गमन करते हैं। पितृ विसर्जन के ठीक दूसरे दिन प्रतिपदा को मातामह श्राद्ध होता है।

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top