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पं शरदचंद्र मिश्र

पितृदोष की शांति के लिए शास्त्रों एवं वास्तु ग्रंथों में कई उपाय कहे गए हैं।
1- अपने गृह की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने दिवंगत पूर्वजों के फोटो लगाकर उसपर हाल चढ़ाकर सम्मानित करना चाहिए। उनकी मृत्यु तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र, दक्षिणा सहित दान, पितृ तर्पण व श्रद्धादि कर्म करने चाहिए।
2- जीवित माता-पिता एवं भाई- बहनों का भी आदर - सत्कार और धन, भोजन, वस्त्रादि से सेवा करते हुए उनका आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए।
3- प्रत्येक अमावस को अपने पितरों का ध्यान करते हुए पीपल पर कच्ची लस्सी, गंगाजल, काले तिल, चीनी, चावल, जल इत्यादि चढ़ाते हुए
‘ऊं पितभ्यप: नम:’
मंत्र तथा पितृ सूक्त का पाठ करना शुभ रहता है
4- प्रत्येक अमावस्या को दक्षिणाभिमुख होकर पितरों के लिए पितृ तपर्ण करना चाहिए। अमावस्या को पितृ सूक्त व पितृ स्त्रोत्र का पाठ करना चाहिए। त्रयोदशी को नीलकण्ठ स्त्रोत्र का पाठ, पंचमी को सूर्य सूक्त का पाठ तथा पूर्णमासी के दिन श्रीनारायण कवच का पाठ करने के पश्चात ब्राह्मणों को मिष्ठान व दक्षिणा सहित भोजन करवाना पितृ दोष की शांति के लिए शुभ होता है।
5- प्रत्येक संक्रांति, अमावस व रविवार को सूर्य देव को ताम्र वर्तन में लाल चंदन, गंगाजल व शुद्ध जल डालकर बीज मंत्र
‘ऊं पितृभ्य: नम:’
पढ़ते हुए तीन बार अर्घ्य दें।
6- नियमित श्राद्ध के अतिरिक्त श्राद्ध के दिनों में गौवों को चारा तथा कुत्तों व भूखों को खाना खिलाना चाहिए।
7-श्राद्ध के दिनों में विशेषकर अण्डा, मांस, शराब, लहसुन, प्याज आदि तामसिक भोजन तथा पराये अन्न से परहेज करना चाहिए।
8- सोमवार के दिन आक के 21 पुष्पों, कच्ची लस्सी, विल्व पत्रादि सहित शिवजी की पूजा करने से पितृ दोष का नाश होता है।
9- पीपल वृक्ष पर मध्याह्न को जल, पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, काला तिल चढ़ाना चाहिए व सायंकाल दीप जलाकर नागस्त्रोत्र, महामृत्युंजय जप या रूद्र सूक्त, पितृ स्त्रोत्र नवग्रह स्त्रोत्र का पाठ करने व ब्राह्मण को भोजन कराने से पितृ दोष की शांति होती है।
10- कुल देवता एवं इष्ट देव की पूजा-अर्चना नित्य करें तो भी पितृ दोष का उपशमन हो जाता है। किसी गरीब कन्या के विवाह या बीमारी में सहायता करें। इसके अतिरिक्त सूर्य पूजा, ब्राह्मणों को दान, समाज के लिए पेयजल की व्यवस्था कराना, पीपल या बरगद के पौधे लगाना, विष्णु मंत्रों का जप करना, श्रीमद्भगवत गीता का पाठ करना, श्रीमद्भागवत महापुराण का पारायण पाठ करवाना, माता-पिता का आदर करना, पितरों के नाम से अस्पताल, मंदिर, विद्यालय व धर्मशाला आदि बनवाने से भी पितृ दोषों की शांति होती है। इसके अतिरिक्त विद्वान ब्राह्मण से परामर्श लेकर अपनी जन्म पत्रिका के अनुरूप उपाय भी करना चाहिए।


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