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शिरडी के सांई बाबा ने दशहरा के दिन 1918 में शरीर छोड़ा था,जिसे सांई भक्‍त महासमाधि दिवस के रूप में मनाते हैं। बाबा ने कोई पंथ और पीठ नहीं बनाई। शरीर छोड़ने के पूर्व उन्होंने भक्‍त लक्ष्मीबाई को अपने पास से नौ सिक्के दिये थे। बाबा ने अपना कोई उत्तराधिकारी भी नहीं बनाया। उनके पास प्रापर्टी के नाम पर एक ईंट थी जिसे उन्हें उनके गुरु ने दिया था। गुरु ने उनसे यह भी कहा था कि जब तक यह ईंट रहेगी तुम्हारा भौतिक शरीर संसार में रहेगा और यही हुआ भी। दशहरा के पूर्व जब मस्जिद की सफाई हो रही थी तो इस दौरान ईंट गिरकर टूट गई। बाबा भिक्षाटन से लौटे तो यह देखकर नाराज हुए लेकिन उन्हें यह एहसास हो गया कि शरीर छोड़ने का समय आ गया है। आठों प्रहर उनके मुख से अल्लाह मालिक का मंत्र गुंजायमान रहता था,जिसने जो कुछ मांगा बाबा ने उसे दिया और आज भी दे रहे हैं। बाबा के भक्‍त भारत ही नहीं पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। मंदिरों की तादाद तो अनगिनत है।

बाबा ने आध्यात्मिक और भौतिक पथ पर चलने के लिए श्रद्धा और सबूरी के मंत्र को जीवन में उतारने की बात कही। श्रद्धा यानी विश्वास और सबूरी से आशय धैर्य से है। उन्हें अपने बारे में किसी प्रचार या ख्याति की जरूरत भी नहीं थी। अपनी मानव काया में वह परब्रह्म परमेश्वर के स्वरूप थे। हेमाडपंत ने उनसे जब विनम्रता पूर्वक यह अनुरोध किया कि वे उनकी जीवन लीला को लेखनीबद्ध करना चाहते हैं, कृपया इससे इनकार मत करिएगा तब बाबा ने उनको अपनी जीवन लीला लिखने की अनुमति दी। आज शिरडी का जो स्वरूप दिखाई देता है वह उस समय नहीं था। शिरडी एक छोटा सा गांव था और बाबा किस जाति-परिवार में पैदा हुए, यह अब तक रहस्य ही है। उनका जीवन संत कबीर दास के जीवन से काफी मिलता-जुलता है। कबीर के शरीर छोड़ने पर हिंदू-मुस्लिम में उनके पार्थिव शरीर की अंतिम गति के लिए विवाद हुआ था और यही कहानी बाबा के शरीर छोड़ने पर भी दोहराई गई। लेकिन बाबा ने जब एक भक्‍त को स्वप्न में आरती करने की बात कही उसके बाद ही बाबा को शिरडी के मौजूदा मंदिर में समाधि दी गई और उनकी आरती शुरू हुई। बाबा तकरीबन सोलह साल की उम्र में शिरडी आए थे और शरीर छोड़ने तक यहीं रहे। श्री सांई सच्चरित्र में ऐसा उल्लेख आता है कि बाबा चांद पाटील की बारात में पहली बार शिरडी आए थे और बारात शिरडी में खंडोबा के मंदिर पर रुकी थी। बारातियों के बीच एक बालक के चेहरे पर देदीप्यमान तेज देखकर खंडोबा मंदिर के पुजारी महालसापति ने पहली बार उन्हें सांई कहकर पुकारा था। चांद पाटील की बारात लौटने के बाद भी बाबा शिरडी से नहीं गए। दरअसल चांद पाटील की बाबा से भेंट औरंगाबाद के जंगल में उस समय हुई जब उनकी घोड़ी गायब हो गई थी। वे उसकी तलाश में घूम रहे थे, इस बीच उन्होंने एक फकीर को निर्जन स्थान में बैठे देखा। फकीर चिलम सुलगाने के लिए जमीन में चिमटा घुसा कर आग निकाल रहा था, यह देख चांद पाटील को घोर आश्चर्य हुआ, वह फकीर के पास पहुंचे तो उन्होंने पूछा कि क्यों परेशान हो,यह बताने पर कि घोड़ी गायब हो गई है, बाबा ने कहा कि नाले के पास जाकर देखो, नाले के पास घोड़ी को चरता देख चांद पाटील को विश्वास हो गया कि यह फकीर साधारण नहीं है, इसके बाद चांद पाटील बाबा को अपने घर ले आए। इस समय जिस स्थान को भक्‍त द्वारका माई कहते हैं वह एक टूटी-फूटी और जीर्ण-शीर्ण मस्जिद थी, बाबा इस मस्जिद में ही आकर रहने लगे। बाबा इसे अपनी द्वारका माई कहते थे। द्वारका माई वह जगह है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति हो। शुरू के दिनों में बाबा प्राय: खामोश ही रहते थे, किसी ने कुछ लाकर दे दिया तो खा लिया अन्यथा ऐसे ही रह गए। बाद में बाबा शिरडी गांव के पांच घरों में जाते और भिक्षाटन करते। जो कुछ मिल जाता उसे वे भिखारियों, कुत्ते, पशु-पक्षियों को भी खिलाते थे। बाबा को पेड़-पौधों से अतिशय प्रेम था, इसलिए शिरडी से रहाता जाते और वहां से फूलों के पौधे लाते। शिरडी मंदिर परिसर में स्थित लेंडी बाग में वे खुद अपने हाथ से पौधे लगाते और उन पौधों को घड़े से लाकर पानी देते। शिरडी में उन दिनों पानी की किल्लत थी लेकिन इसके बावजूद बाबा का पौधों को रोज ही पानी देने का क्रम जारी रहता। उनके साथ भागोजी सिंदिया नामक भक्‍त रहा करते थे जिन्हें कुष्ठ रोग था, उनके कई अंग गल भी चुके थे लेकिन बाबा अपने हाथ से उनके घाव साफ करते और सबसे ज्यादा उनको स्नेह देते थे। अब्दुल बाबा नामक भक्‍त भी उनके साथ रहा करते थे। आज भी उनके परिवार की ओर से बाबा की समाधि पर फूल चढ़ाया जाता है। बाबा ने अपने कार्य व्यवहार से हमेशा हिंदू-मुस्लिम को एक नजरिए से देखा, वे किसी जाति पंथ में विश्वास नहीं करते थे। उनका सबसे बड़ा धर्म मानव धर्म है। बाबा से जब कोई हिंदू-मुस्लिम की बात करता तो प्राय: नाराज हो जाते, वे एक ही बात कहते कि सबका मालिक एक है। एक बार एक पंडित जी शिरडी पहुंचे, उन्हें किसी ने बाबा के बारे में बता रखा था, उन्हें अपने ब्राह्मणत्व व पांडित्य का अहंकार ज्यादा था, बाबा द्वारका माई मस्जिद में बैठकर रोटी और प्याज खा रहे थे। पंडित जी ने बाबा को रोटी प्याज खाते देखा तो उनके मन में ख्याल आया कि ये कैसे संत, जो प्याज खा रहे हैं, बाबा को पंडित जी के मन का भाव समझते देर न लगी, उन्होंने कहा कि प्याज वही खाए जो पचा सके, यह बात सुनकर पंडित जी बाबा के चरणों मे नतमस्तक हो गए। बाबा ने हमेशा अंधविश्वास का विरोध किया। एक बार की घटना है कि शिरडी में हैजा फैला हुआ था, गांव में लोग लकड़हारों की गाड़ी भी नहीं आने दे रहे थे, बाबा को जब यह बात पता लगी कि लकड़ी लदी गाड़ी को लोग गांव में नहीं आने दे रहे हैं तो उन्होंने उस गाड़ी की लकड़ी को खुद खरीद लिया और उस लकड़ी का अपनी धुनी में इस्तेमाल किया। बाबा को रोशनी से बेहद प्रेम था। वे मस्जिद में दीप जलाने के लिए बाजार के दुकानदारों से तेल मांग कर लाया करते थे लेकिन उस दिन दुकानदारों ने तय किया कि वे उन्हें तेल नहीं देंगे, बाबा को जब कहीं से तेल नहीं मिला तो वे चुपचाप मस्जिद लौट आए और पाट में जो तेल बचा हुआ था, उसमें ही पानी का कुल्ला किया और इसी पानी से दीप जला दिये। यह घटना शिरडी के लोगों के लिए विस्मयकारी थी और इस घटना के बाद ही लोगों को बाबा के अलौकिक स्वरूप का एहसास हुआ। बाबा प्राय: उपदेश नहीं करते थे, वे दृष्टान्तों के माध्यम से संबंधित व्यक्ति को इसका एहसास करा देते थे। शिरडी में एक ऐसा व्यक्ति बाबा के पास आता था,जो प्राय: अपने भाई की कटु शब्दों में निन्दा किया करता था, बाबा उस समय चुप रहते थे। एक दिन बाबा लेंडी बाग जा रहे थे और वह व्यक्ति भी बाबा के साथ था। सामने एक सुअर बिष्‍टा खा रहा था, बाबा ने उस व्यक्ति से कहा कि देखो वह कितने चाव से उसे खा रहा है, निन्दा का रस भी इसी तरह का है। बाबा के पास प्राय: साधु संत, औलिया सभी आते रहते थे, सबको खाना बनाकर खिलाने में भी उन्हें आनन्द आता था। आज भी शिरडी मंदिर में किसी तरह का भेदभाव नहीं दिखता, लाखों लोग रोज ही वहां बाबा का दर्शन करते हैं। दरअसल बाबा ने धर्म के सरल स्वरूप को समाज के सामने रखा। वे कहते भी थे कि जब तक तू और मैं का भेद खत्म नहीं होता तब तक हम परमतत्व को नहीं समझ सकते। अनन्त कोटि ब्रहण्ड नायक राजाधिराज योगिराज श्री सांईनाथ महाराज की जय।

- उपेंद्र पांडेय

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