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कर्मकाण्डवेत्ता पं. मनोज मिश्र ने कहा कि शनिवार न्यायप्रिय ग्रह शनि का दिन है। शनि राजयोग कारक ग्रह हैं। ये प्रसन्न होने पर राज्य सुख, समृद्धि तो देते हैं किन्तु कुपित होने से या कुंडली में अनिष्ट कारक होने से समस्त कार्यों में बाधा, पारिवारिक क्लेश, मानसिक अशांति व शारीरिक बाधा देते हैं। इसलिए शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनिवार का व्रत विधान पूर्वक करने से मनोनुकूल कार्य सिद्ध होते हैं। जिस जातक की कुण्डली में या गोचर में शनि चतुर्थ, द्वादश, अष्टम अथवा साढ़ेसाती या ढैया में हों, उस जातक को शनि की पूजा कर उन्हें प्रसन्न करना चाहिए। राहु-केतु की शांति के लिए भी शनिवार व्रत का विधान मत्स्य पुराण व भविष्य पुराण में मिलता है।

विधान
प्रात:काल उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर काले कंबल के आसन पर बैठकर लौह पात्र में काले रंग से रंगे हुए चावल से धनुषाकार शनि की आकृति बनाकर काले वस्त्र के आसन पर स्थापित करें। केशर मिले हुए लाल चंदन, अक्षत फूल (काला या नीला), धूप जलाएं। काली राई या सरसो के तेल अथवा काले तिल के तेल में दीपक जलाकर काले उड़द से बनी पक्वान्न का भोग लगाकर शनि देव का विधिवत पूजन करें। ‘ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:’ मंत्र का 108 बार जप करें। इसके बाद शमी की लकड़ी से हवन करें जिसमें काली गाय के घी, काले तिल व गुड़ से 108 बार आहुति दें। यदि राहु अनिष्ट कारक हों तो ‘ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:’ मंत्र से 108 बार आहुति दूर्वा व काले तिल से, यदि केतु अनिष्ट कारक हों तो ‘ऊं स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नम:’ मंत्र से 108 आहुति कुश, काले तिल व काली गाय के घी से करना चाहिए। इस व्रत में संभव हो तो फलाहार का ही सेवन करें अथवा सायंकाल काले उड़द से बने हुए भोज्य पदार्थों का एक बार सेवन करें। काली गाय, काले कुत्ते को ग्रास दें, काली वस्तुओं का दान करें।

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