0
परम आराध्य सती शिरोमणी कुलदेवी श्री राणी सती दादी जी का जन्म संवत् 1638 को हरियाणा की प्राचीन राजधानी महम के डोकवा उपनगर में हुआ।


इनका विवाह स्व.सेठ श्री जालीराम जी के सुपुत्र श्री तनधनदास जी के साथ मंगसिर शुक्ला नवती सम्वत 1651 को बड़े ही धूमधाम से सम्पन्न हुआ। विवाह सम्पन्न होने के पश्चात मंगसिर कृष्ण नवमी सम्वत 1652 को गौने की तिथि निश्चित हुई। निश्चित तिथि पर श्री तनधनदास जी गौना कराने लश्कर लेकर महम पहुंच गए व उनके साथ सेवक राणा जी भी गए थे। गौने के पश्चात विदाई कराकर वापस आते समय देवसर की पहाड़ियों के बीच दुश्मन ने श्री तनधनदास के लश्कर पर धावा बोल दिया। दुश्मनों से युद्ध करते हुए तनधनदास जी वीरगति‍ को प्राप्त हुए। पालकी में बैठी मां नारायणी जी को जब यह ज्ञात हुआ तो महाकाली का रुप बनाकर दुश्मनों की सेना का सफाया कर दिया व राणा जी को आदेश दिया की चिता की तैयारी करो, मैं इसी स्थान पर देवसर की पहाड़ियों में सती होऊंगी। सेवक ने आदेश का पालन किया और मां नारायणी मंगसिर कृष्ण नवमी सम्वत 1652 को अपने पति तनधनदास जी के साथ सती हो गई। सती होने के पश्चात दुर्गा रुप में प्रकट हो राणाजी को आदेश दिया कि यह भस्मी मेरी घोड़ी पर रखकर ले जाना जहां रुक जाए वही पधरा देना। मै वहां त्रिशूल रुप में दर्शन देकर जन-जन का कल्याण करुंगी व हे राणा मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न होकर तुझे ये वरदान देती हूं कि तेरे ही नाम पर मैं कलयुग में विख्यात होऊंगी। जन-जन मुझे राणी सती नाम से ही जानेगा यह नाम अब भी राणी सती दादी के नाम से विख्यात है।

श्री राणी सती दादाजी के सती होने के पश्चात इनके कुल में सम्वत 1862 तक 12 और सतियां हुई हैं। अन्तिम सती भादी मावस को हुई थी। इसलिए भादी मावस का उत्सव स्मृति रुप में देश में ही नहीं विदेशों में भी बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top