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ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री व्रत की हमारी परंपरा है। यह व्रत महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य के लिए रहती हैं। पुराणों के अनुसार इस व्रत में वट वृक्ष की पूजा की जाती है। यह व्रत सावित्री द्वारा अपने पति को पुन: जीवित करा लेने की स्मृति में रखा जाता है। वट वृक्ष की पूजा अखंड सौभाग्य (पति की दीर्घायु) व अक्षय उन्नति के लिए की जाती है। पूजन सामग्री में समस्त सुहाग सामग्रियां व पंखा शामिल किया जाता है। मंगल गीत गाने व पारंपरिक कथाओं को सुनने की समृद्ध परंपरा भी देखने को मिलती है। व्रती महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए उसके तने को सूत से लपेटती हैं और पूजन-अर्चन के बाद मंगल कामना करती हैं।

कैसे करें व्रत व पूजन

पं. शरद चंद्र मिश्र के अनुसार वट सावित्री व्रत तीन दिनों का है। यदि तीन दिन व्रत रहने की सामर्थ्य नहीं है तो त्रयोदशी के दिन एक भुक्त व्रत, चतुर्दशी को अयाचित व्रत और अमावस्या को उपवास करना चाहिए। अमावस्या के दिन बांस की टोकरी में सप्तधान्य रख लें। एक जगह ब्रह्मा व सावित्री तथा दूसरी जगह सत्यवान व सावित्री की प्रतिमा रखें। वट वृक्ष के नीचे बैठकर पहले ब्रह्मा-सावित्री, उसके बाद सत्यवान-सावित्री का पूजन करें। सावित्री के पूजन में सौभाग्य वस्तुएं चढ़ाएं। इसके बाद वट वृक्ष का पूजन करें। भाव से उसकी उसकी जड़ों को जल से सींचकर उसकी परिक्रमा करते हुए वट वृक्ष के तने को सूत से लपेटें। विधान तो 108 बार परिक्रमा करने का है, यदि संभव न हो तो सात बार परिक्रमा करें। उसे पंखा झलें। अंत में वट सावित्री व्रत की कथा सुनें।

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