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लेखक- सुशील कुमार, डीआईजी आईटीबी, शिलांग
जाही विधि राखे राम वाही विधि रहिए, सीताराम, सीताराम सीताराम कहिए। यह संकेत है सर्व स्वीहकार भाव का। सर्व स्वीरकार मतलब पूरा समर्पण, अब जैसी तेरी मर्जी। कर्ता भाव का त्या ग। कर्ता भाव अहंकार को पोषित करता है। इसका विसर्जन ही धर्म है। इसीलिए भक्ति को सर्वोपरि माना गया है। भक्त् नाचते हुए चल देता है। उसे अब किसी चीज की जरूरत नहीं, किसी सहारे की जरूरत नहीं है। उसने परमात्मार पर सब छोड़ दिया। अब उसे संभालना होगा तो संभालेगा, उसे छोड़ना होगा तो छोड़ देगा, भक्तो स्वउयं को कभी नहीं संभालता। भक्त् जब स्वोयं को संभालने लगता है तो इसका सीधा मलतब है कि उसे अभी अपने पर कुछ विश्वाास है, जब तक वह स्वलयं को संभालता है, परमात्माव उसे छोड़े रहता है, उसकी तरफ देखता भी नहीं। कहा जाता है कि एक बार रूक्मिणी ने कृष्णो को भोजन की थाली परोसी। कृष्णक अभी पहला कौर ही मुंह में डाले थे कि अचानक दरवाजे की तरफ भागे। रूक्मिणी समझ नहीं पाई कि क्या हो गया। दरवाजे तक वह बड़ी तेजी से गए लेकिन दरवाजे तक जाते-जाते उनके कदम रुक गए और वह वापस आ गए। ि‍फर भोजन करने लगे। रूक्मिणी ने पूछा कि क्याी हो गया था। कृष्णर ने कहा कि हुआ तो था लेकिन दरवाजे तक जाते-जाते सब समाप्तु हो गया। मेरा एक भक्तय राह में चला जा रहा था। लोग उसे पत्थ र मार रहे थे, वह कोई प्रतिक्रिया नहीं कर रहा था केवल कृष्ण -कृष्ण चिल्लाोता चला जा रहा था। इसलिए मुझे भागना पड़ा। लेकिन जब तक मैं दरवाजे पर पहुंचू, उसने भी एक पत्थार उठा लिया। जब उसने भी पत्थार उठा लिया तो मेरा काम समाप्तल हो गया और मैं लौट आया। कहानी सच या है झूठ यह मैं नहीं जानता लेकिन कहानी से जो तथ्यय निकल कर आ रहे हैं वह सत्यज हैं। परमात्माो उसकी तरफ देखता ही नहीं जिसे थोड़ा भी अपने पर भरोसा है। स्वतयं पर से जब पूरा भरोसा खत्म हो जाता है, भक्तव केवल भगवान के भरोसे हो जाता है, तब भगवान की पूरी दृष्टि भक्तव पर होती है।
भक्ति का मार्ग बहुत सरल है लेकिन उतना ही कठिन भी। सरल इसलिए कि इस मार्ग में स्वैयं कुछ करना ही नहीं, केवल समर्पण करना है। लेकिन समर्पण करना सरल नहीं है। क्यों कि समर्पण में व्यकक्ति स्व यं को खो देता है, स्व्यं को खो देना बहुत आसान नहीं है। स्वययं को खो देने का मतलब है संसार को खो देना। स्व यं है तो ही अहंकार है। और जब तक अहंकार है तब तक समर्पण संभव नहीं है। अहंकार का विदा होना स्वकयं का खत्मम हो जाना है। इसलिए यह मार्ग कठिन भी है।
आज चारो तरफ भक्ति दिखती है। कहीं भागवत कथा हो रही है, कहीं श्रीराम कथा हो रही है, कहीं कोई अनुष्ठा,न हो रहा है तो कहीं तमाम देवी- देवताओं की पूजा-अर्चना, व्रत, उपवास चल रहा है। लेकिन मनुष्य- नहीं बदल रहा है। मनुष्यर और जटिल होता जा रहा है। भक्ति तो रूपांतरित करके रख देती है। तो यह क्या हो रहा है। श्रीमदभागवत में एक कथा आती है। नारदजी जा रहे हैं, यमुनाजी के तट पर एक सुन्द र नवयौवना उन्हेंा पुकारी। नारदजी ने पलट कर देखा तो एक सुन्दएर नवयौवना के पास दो वृद्ध व बीमार पुरुष भी पड़े हैं। उन्होंनने पूछा कि देवि तुम कौन हो तो उसने कहा कि मैं भक्ति हूं और ये दोनों मेरे पुत्र हैं- ज्ञान व वैराग्यक। जो असमय बीमार व बूढ़े हो गए हैं, इन्हेंच स्व स्थज करने का कोई उपाय बताएं। नारद जी सनकादिक ऋषियों की सहायता से उन्हेंा स्वकस्थउ करते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति जननी है ज्ञान व वैराग्यस की। यदि भक्ति कहीं है तो ज्ञान व वैराग्यत भी होने ही चाहिए। लेकिन ज्ञान व वैराग्यह नजर नहीं आते। भक्ति चारो ओर दिखती है। इसलिए सवाल पैदा होता है कि जो दिख रहा है वह सचमुच भक्ति ही है या कुछ और। क्यों कि भक्ति जितनी सरल है उतनी ही कठिन ही। यह मार्ग बहुत कंटकाकीर्ण भी है और फूलों से भरा भी। कांटे भी चुभते हैं और सुगन्धा भी मिलती है लेकिन भक्त। को दोनों से मतलब नहीं होता, कांटे चुभे तो परमात्माक की मर्जी से सुगंध मिली तो परमात्माा की मर्जी से। वह इन बातों की नोटिस नहीं लेता और अपने मार्ग पर बढ़ता रहता है। इसलिए जब तक पूरा समर्पण न घट सके तब तक भक्ति नहीं। जब पूरा समर्पण घट जाए तब कुछ शेष बचता ही नहीं है। वहीं व्यरक्ति अपनी निजता में खिल उठता है, अपनी गरिमा में पल्ल्वित-पुष्पित हो जाता है। वही उसके जीवन का चरम लक्ष्यी भी है।

keyword: vichar-vimarsh

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