0
ईदुल अजहा यानी बकरीद का पर्व 27 से 29 अक्टूबर की शाम तक चलेगा। बकरीद पर कुर्बानी के बारे में बताने से पहले हज के बारे में जानना जरूरी है। इस्लाम में हज मुसलमानों की जिंदगी का वह पांचवां हिस्सा है जो अपने जीवन काल में कम से कम एक बार मुसलमानों को करना ही चाहिए। इस्लाम में हज एक ऐसा अमल है जिसमें इंसान गुनाहों से इस तरह पाक-साफ होता है, जैसे कोई नवजात बच्चा , जिसे सांसारिक चीजों से कोई लेना देना नहीं होता। हज के दौरान जो कार्यक्रम होते हैं वह पूरी तरह रूहानी तत्वों से परिपूर्ण होने का एहसास दिलाते हैं। हाजी खाना-ए-काबा की परिक्रमा के समय आम वस्त्र धारण करने के बजाय बिना सिले हुए वस्त्र धारण करते हैं। इस दौरान लोग अपने आप से बेखबर रहते हैं। जो बदहवास हों, जिसे लक्ष्य की प्राप्ति के अतिरिक्त किसी अन्य की चाहत न हो, हाजियों को उस समय अपने रसूल और अल्लाह के सिवा किसी और की सुधि नहीं रहती है।
अल्लाह को बेहद पसंद है कुर्बानी
मौलाना अतहर सिद्दीकी व शहरे काजी मुफ्ती मौलाना वहीउल्लाह बताते हैं कि हजरत इब्राहीम की याद में मनाए जाने वाले इस पर्व की खासियत यह है कि अल्लाह को कुर्बानी बेहद पसंद है। कुर्बानी सुन्नते इब्राहीमी है और सभी साहबे निसाब (हैसियत वालों) पर फर्ज है। अल्लाह के नजदीक सबसे बड़ी इबादत कुर्बानी के जानवर का खून बहाना है। अल्लाह के रसूल (स.) ने फरमाया जो साहबे निसाब हो और कुर्बानी न करता हो, वह मेरी ईदगाह के करीब न आए। कुर्बानी मुहब्बत की अलामत है। हजरत इब्राहीम अलै. ने अपने बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी पेश की तो अल्लाह ने कहा कि ऐ इब्राहीम तूने सच कर दिखाया, तू मेरा सच्चा आशिक है, और अल्लाह ने जन्नत से एक टुम्बा भेजकर हजरत इस्माइल अलै. के बदले में कुर्बानी अदा की।
इस्लाम में कुर्बानी अपने आप में एक गौरवशाली दर्शन है। वैसे कुर्बानी की परिकल्पना हर मजहब में किसी न किसी रूप में मौजूद है लेकिन इस कुर्बानी के बारे में इस्लामिक विद्वानों का मानना है कि इसका तसव्वुर ही कुछ और है। अल्लाह ने अपने वलियों और पैगम्बरों की इसके लिए कड़ी परीक्षा ली थी। इसी परीक्षा में हजरत ने सपना देखा था कि अल्लाह का हुक्म है कि इब्राहीम तुम अपने सबसे अजीज की कुर्बानी मेरी राह में करो। हजरत इब्राहीम ने अपने एक पालतू टुम्बे की कुर्बानी कर दी, जिसे वह बेहद चाहते थे। लेकिन दूसरे दिन हजरत इब्राहीम ने यह बात अपने बेटे हजरत इस्माइल को बताई तो वह स्वयं कुर्बानी के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गया। हजरत इब्राहीम अलै. ने बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए ‘मेना’ सऊदी अरब के मैदान में अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर अपने बेटे हजरत इस्माइल की अल्लाह के नाम पर कुर्बानी दे दी। कुर्बानी के बाद जब उन्होंने अपनी आंखों से पट्टी खोली तो देखा उनके बेटे हजरत इस्माइल दूसरी ओर खड़े होकर मुस्करा रहे थे और उनकी जगह पर एक टुम्बा जिबह हुआ है। तभी से अरबी महीने जिलहिज्जा की दसवीं तारीख से तीन दिनों तक अल्लाह की राह में कुर्बानी की जाती है।
keyword:islsm, bakarid

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top