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विजयादशमी। असत्य पर सत्य की जीत का दिन। इसी दिन राम ने रावण का वध किया था। सत्य जीता था, असत्य पराजित हुआ था। प्रकाश जीता था, अंधकार हारा था। इसी लिए यह दिन आम आदमी का उत्सव बन गया। यह दिन हमें अशुभ से शुभ की ओर प्रेरित करता है। यह दिन केवल राम के विजय का दिन नहीं है समग्र मनुष्यता के विजय व खुशी का दिन है। रावण वध में अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग हुआ था। इसी लिए इस दिन अस्त्र-शस्त्र पूजा की परम्परा है।
विजयादशमी बुधवार को परम्परागत रुप से हर्षोल्लास के साथ मनाई जायेगी। शस्त्र पूजन कैसे करें, क्या है इसका महत्व ,नीलकंठ दर्शन का क्या है महत्व आदि पर विस्तार बता रहे हैं ज्योतिषाचार्य पं. शरदचन्द्र मिश्र। श्री मिश्र के अनुसार विजयादशमी के दिन ब्राह्म्ण, सरस्वती, अस्त्र-शस्त्र एवं शमी वृक्ष का पूजन होता है। इसी दिन प्रात. स्नान के बाद घर के आंगन में दशहरा का चित्र चूने या गेरु से बनाया जाता है। इसमे पुरुषाकृति व उसके दोनों ओर अस्त्र-शस्त्र व सामने नवैद्य रखा जाता है। साथ ही एक कलश और धूप-दीप के चित्र बनाये जाते हैं। इसके बाद ऊपर से गोबर की नौ टिकड़िया (बिन्दिया) लगाई जाती हैं। तत्पश्चात केला, मूली व ग्वारफली के साथ श्रद्धानुसार दक्षिणा रख कर धूप-दीप प्रज्जवलित कर जल , मोती, रोली, चावल, पुष्प, ज्वार इत्यादि से पूजन किया जाता है। पूजन करके दक्षिणा में एक सिक्का उठाकर धन-धान्य वृद्धि की कामना करते हुए तिजोरी अथवा धन रखने के स्थान पर रखते हैं। इसके बाद खीर पूड़ी आदि बनाकर भगवान राम को भोग लगाकर और रामचन्द्र जी की पूजा कर ब्राह्म्ण पूजन के साथ यथाशक्ति दक्षिणा दें। उन्होंने बताया कि विजयादशमी के दिन जहां चित्र में अस्त्र-शस्त्र बनाते हैं वही कलम-दवात एवं बही-खाते की पूजा भी की जाती है। इस दिन व्यापारी विभिन्न वस्तुओं के बाजार भाव एक कागज पर रखकर पूजा करते हैं। उस पुरुषाकृति चित्र का पूजन किया जाता है इसे दशहरा पूजा कहते हैं। इस दिन नये खाते-बही का भी पूजन प्रारंभ किया जाता है। आज के दिन प्रारंभ किये गये सभी कार्य सफल होते हैं। नवरात्र में स्थापित प्रतिमा का विसर्जन और नवरात्र व्रत के परायण का दिन है।
एक बार मां पार्वती ने शिवजी से दशहरा पूजन के सम्बध के और इसके फल के विषय में पूछा। तब शिव ने उत्तर दिया कि विजय के इच्छुक को विजयादशमी के दिन प्रस्थान करना चाहिए। इसी दिन रामचन्द्र ने लंका पर चढ़ाई की थी। प्रत्येक वीर पुरुष को नगर के बाहर जाकर लौटना चाहिए।
शमी वृक्ष की पूजा जरुरी
जब पाण्डवों को बारह वर्ष का अज्ञातवास हुआ तब दुर्योधन ने एक शर्त रखी कि इस अवधि में पहचान लिए जाने पर पुन: अज्ञातवास 12 वर्ष के लिए भोगना पड़ेगा। इस लिए पहचान छिपाने के लिए अर्जुन ने अपना गाण्डीव (धनुष) शमी के वृक्ष पर रख दिया। कुछ समय पश्चात गायों पर अत्याचार कर रहे राजा विराट के शत्रुओं को सबक सिखाने के लिए शमी से कुछ समय के लिए गाण्डीव लिये और विजय प्राप्त किया। इसके पूर्व श्रीराम ने लंका विजय अभियान पर जाते समय शमी वृक्ष की पूजा की थी उस समय विजयादशमी और विजयकाल था। तब शमी ने श्रीराम को विजय का आशीर्वाद दिया। विजय मुहुर्त में कवजया देवी का पूजन करने से सर्वत्र सफलता मिलती है। आज के दिन दोपहर में ईशान कोण में पवित्र स्थान पर चन्दन, कुंकुम और कमल के पुष्य अर्पितकर धूप-दीप से अपराजिता, जया और विजया देवियों का पूजन करना चाहिए। ढ़ोल बाजे के साथ शमी देवी का पूजन कर जड़ से मिट्टी लेकर धूमधाम से लौटकर मिट्टी को पवित्र स्थान्न पर रखना चाहिए। विजयादशमी के दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।
पूजन का समय
गोरखपुर। अभिजित मुहुर्त में दिन में दोपहर को 11 बजकर 38 मिनट स९ 12 बजकर 23 मिनट तक। द्वितीय विजय मुहुर्त में दोपहर के बाद 1 बजकर 53 से 2 बजकर 38 मिनट तक।
विजयादशमी पर करें अस्त्र-शस्त्र का पूजन

keyword: dashahara

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