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लेखक- स्‍वाती श्रीवास्‍तव
गोरक्षनगरी के उत्तर भाग में स्थित गीतावाटिका आज भारतीय मनीषा, साधना, तप तथा धार्मिक-आध्यात्मिक अनुष्ठानों का केन्द्र बन गई है। इस स्थली को विश्वविख्यात गीताप्रेस से प्रकाशित आध्यात्मिक पत्रिका कल्याण तथा अंग्रेजी पत्रिका कल्याण-कल्पतरु के आदि संपादक व संस्थापक श्री भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार तथा महाभाव के दिनमणि पूज्य श्री राधा बाबा (स्वामी चक्रधर महाराज) की तपस्थली होने का गौरव प्राप्त है। भाईजी से सन 1927 से 1971 तक यानि कि 45 वर्ष तक इसी गीतावाटिका के एकांत स्थल में निवास कर उपर्युक्त पत्रिकाओं का संपादन किया और प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की ज्योति भारत ही नहीं विश्व में फैलाई। कल्याण का संपादकीय विभाग यहीं स्थापित हुआ जो अब गीताप्रेस में है। इसी स्थली में राधा बाबा ने भी लगभग 43 वर्ष तक साधना की। भाई जी के स्वर्गवास के दौरान उनके दुनिया भर में फैले महानुभावों ने उनके जीवन के आदर्शों को मूर्तरूप देने के लिए जनसेवा के लिए एक न्यास की स्थापना की, जिसके अध्यक्ष प्रसिद्ध उद्योगपति एवं विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष विष्णुहरि डालमिया हैं। भाईजी की समाजसेवा की भावना को आगे बढ़ाने के मकसद से हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल एवं शोध संस्थान के नाम से एक चिकित्सालय भी है जो उत्तवर प्रदेश का सबसे बड़ा कैंसर चिकित्सालय है। भाईजी के आध्यात्मिक पक्ष के संवर्धन हेतु श्री राधा कृष्ण साधना मंदिर का निर्माँण गीतावाटिका परिसर में ही किया गया है।
मंदिर में भाईजी एवं राधा बाबा के आराध्य श्रीराधाकृष्ण के एक दूसरे से अलग होते हुए भी पास होने का आकर्षण सहज ही मन को खींचने लगता है। इसी मंदिर में सिद्धिदाता गणेश, सीताराम, गौरीशंकर, लक्ष्मी नारायण, मां दुर्गा, भगवती महात्रिपुरसुंदरी, हनुमान एवं सूर्यनारायण की प्राणप्रतिष्ठित बड़ी मूर्तियां हैं। देवमूर्तियों के पृष्ठदेश में स्वामी कार्तिकेय एवं मां सरस्वती के विग्रह हैं। इसके साथ ही हस्तलिखित श्रीमद्भागवत, वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस एवं षोडश गीत भी है। मंदिर के सामने हाथ जोड़े भाई जी की भव्य मूर्ति स्थापित है। देवालय में विधि-विघान से नित्य पूजा की जाती है। हिंदी पंचांग के अनुसार विशिष्ट तिथियों पर विशेष उत्सव होते हैं। हर मंगलवार को सुंदरकांड का पाठ होता है। भक्तगण पवनपुत्र की आराधना करते हैं। रामनवमी, हनुमतजयंती, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रथयात्रा, मंदिर का पाटोत्सव, होली, ढूलन, नवरात्र आदि के उत्सव विशेष रूप से आयोजित होते हैं। ऐसा माना जाता है कि गीतावाटिका में ही भाईजी, उनकी धर्मपत्नी तथा राधा बाबा ने अपने पांच भौतिक कलेवर का परित्याग किया था। उनकी समाधियां साधकों की श्रद्धा का केन्द्र बिंदु हैं। वहां भी नित्य पूजन-अर्चन होता है। उनके आने और जाने दोनों ही तिथियों पर देश के सुप्रसिद्ध कथाकारों द्वारा कथा, वृंदावन की ख्यातिप्राप्त रासमंडली द्वारा श्रीकृष्ण लीला, भक्तलीला एवं चैतन्यलीला का प्रस्तुतिकरण होता है। राधा बाबा ने वाटिका में श्रीगिरिराज जी की भी स्थापना की थी। वह जीवन भर उनकी परिक्रमा करते रहे और उस परंपरा को आज भी निभाया जाता है।
अगर कम शब्दों में कहा जाए तो हिंदू त्यौहार और संस्कृति का शायद ही ऐसा कोई रंग होगा जो गीतावाटिका में देखने को नहीं मिलता है। ब्रज की तरह यहां भी दीपावली के के दूसरे दिन विशेष रूप से गोवर्धन पूजा और अन्नकूट के रूप में गिरिराज को भोग लगाया जाता है। भक्त गिरिराज-परिक्रमा करते हैं और भोग लगाते हैं। ब्रज की सप्तकोसी परिक्रमा के नियमानुसार यहां विश्रामस्थल बने हुए हैं। कहा जाता है कि राधा बाबा उसी के अनुसार सभी नियमों का निर्वाह करते थे। भक्त तो यह भी मानते हैं कि यहां पर श्रीगोवर्धन प्रत्यक्ष हैं। गीतावाटिका में पिछले कई सालों से एक मंत्र का जाप लगातार बिना रुके हो रहा है। बताते हैं कि वर्ष 1968 में भाईजी ने षोडशाक्षर मंत्र- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। का अंखड संकीर्तन शुरू किया था। यह आज भी उसी रूप में बिना रुके चल रहा है। श्री चैतन्यदेव ने हरिनाम संकीर्तन का महत्व सर्वोपरि बताया है और भाईजी उसके प्रबल सर्मथक थे। मंदिर में 24 घंटे घी का अखंड दीपक जलता रहता है। कहते हैं कि उस दीपक के काजल को लगाने से दैहिक, दैविक, भौतिक तापों का नाश हो जाता है। इसके साथ ही ऐसा भी कहा जाता है कि भाई जी को देवर्षि नारद एवं ब्रम्हर्षि अंगिरा ने साक्षात दर्शन दिए थे। मंदिर में उस पवित्र स्थल पर एक अतिसुंदर नारद मंदिर का निर्माण किया गया है।

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  1. आत्मविश्वास वह संबल है, जो रास्ते की हर बाधा को धराशायी कर सकता है |

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