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पुत्रों के दीर्घायु व आयुष्य की कामना का व्रत जीवत्पुत्रिका व्रत (जिउतिया) 8 अक्टूबर (सोमवार) को है। इसकी तैयारियां शुरू हो गयी हैं। ज्योतिषाचार्य पं. शरद चंद मिश्र ने कहा कि पंचाग के अनुसार 8 अक्टूबर को सूर्योदय 6.11 बजे है और अष्टमी तिथि का मान रात्रि 9.30 बजे तक है। इस दिन अष्टमी का मान 24 दण्ड 29 पल है। उदय व प्रदोष दोनों में अष्टमी होने के कारण देश के समस्त पंचांगकारों ने 8 अक्टूबर को जीवित्पुत्रिका के लिए प्रशस्त तिथि माना है। मध्याह्न के पश्चात यदि अष्टमी तिथि विद्यमान है तो व्रत उसी दिन किया जाता है- पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा प्रदोषे यत् चाष्टमी पूज्यस्तत् स नरिभि: राजा जिमूतवाहन।
भविष्य पुराण के अनुसार इस दिन माताओं को जीवत्पुत्रिका व राजा जिमूतवाहन का पूजन षोडसोपचार विधि से पूर्ण निराहार रहकर करना चाहिए। इस व्रत को द्वापर के अंत में व्यासजी ने शोकाकुल स्त्रियों के दु:ख निवारण के लिए प्रकाशित किया। महर्षि गौतम से स्त्रियों ने प्रश्न किया कि उनके पुत्र किस व्रत से दीर्घायु होंगे। महर्षि ने कथा के माध्यम से जीवत्पुत्रिका व्रत पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सूर्यवंश में पैदा हुए राजा जिमूतवाहन एक स्त्री के पुत्र की रक्षा के लिए गरुण को अपने शरीर के मांस खण्ड का दान कर दिये। गरुण प्रसन्न होकर स्वर्ग लोक से अमृत लाकर उन बच्चों के अस्थि समूहों पर उसे बरसाये जिन बच्चों का उन्होंने भक्षण किया था। वे सभी जीवित होकर दीर्घायु हो गये। उस दिन अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। गरुण ने वरदान दिया कि जो स्त्री इस दिन जीवत्पुत्रिका की कुश की आकृति बनाकर पूजा करेगी, उसका सौभाग्य बढ़ेगा और वंश की वृद्धि होगी- तासां सौभाग्य वृद्धिश्च वंशवृद्धिश्च शाश्वतम्। भविष्यति महाभाग नाऽत कार्या विवरणा।।
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कैसे करें पूजन
ज्योतिषाचार्य पं. शरद चंद्र मिश्र के अनुसार जीवत्पुत्रिका व्रत रहने वाली स्त्रियां व्रत के लिए निम्न संकल्प लें- अहं अमुकनाम्नी मम पुत्रस्य आरोग्य लाभ पूर्वक दीर्घायूषो सर्वविध कल्याणं च जीवत्पुत्रिका व्रतं करिष्ये। पुन: दिन भर निराहार रहें। दोपहर बाद या सायंकाल सोने, चांदी या सूत की बनी जीवत्पुत्रिका एवं राजा जिमूतवाहन की पूजा करें। जिमूतवाहन की प्रतिमा कुश की होनी चाहिए लेकिन वर्तमान समय में बरियार वृक्ष को उनका प्रतीक मानकर पूजन करने की परंपरा है। पूजन के दौरान निम्न मंत्र से आवाहन करें- जीत्पुत्रि: समागच्छ गौरीरूपधनेऽनघे। ईश्वरस्य पदाम्भोजादत् सन्निहिता भव।। ऐहि ऐहि नृपशार्दूल राजन् जीमूतवाहन। कृपया मेऽत् सान्निध्यं कल्पयस्व सदाप्रभो।। आवाहन के बाद पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्तु, यज्ञोपवीत, गंध, अक्षत, पुष्प, पुष्पमाला, दूर्वा, वेलपत्र, अबीर, बुक्का गुलाल, रोली, सिन्दूर, हल्दी, इत्र, अगरबत्ती, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल व दक्षिणा से सविधि पूजन करें। आरती के बाद प्रार्थना करें- जीवित्पुत्रि महाभागे जीवन्तु मम पुत्रका:। आयुर्वर्द्धय पुत्राणां पत्युश्च मम सर्वदा।। नमस्ते नृपशार्दूल राजन जीमूतवाहन। पति पुत्र जनोत्कर्षं वर्द्धयस्व जनेश्वर।। इसके अलावा रात्रि में भजन-कीर्तन किया जाता है। दूसरे दिन पूजा मंक चढ़ाई गयी सामग्री ब्राह्मण को देकर नवमी में पारण किया जाता है।

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