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लेखक- श्रीमती रीता अग्रवाल
जीवन के सर्वाधिक महत्वीपूर्ण संस्का रों में सबसे महत्व पूर्ण व प्रामाणिक संस्कातर है विवाह। विवाह न केवल मानवीय
आवश्यककता है वरन प्रकृति के संतुलन, मनुष्य के संतुलन व राष्ट्र तथा समाज के विकास के लिए अनमोल उपहार है। पुरुष की पूर्णता इस संस्कासर की सफलता पर निर्भर करती है। इस संस्का्र की सफलता के मूलभूत आधार शारीरिक, मानसिक, आर्थिक तथा आध्यासत्मिक स्तंूभों पर निर्भर करती है।
हमारे मनीषियों ने विवाह के संस्का्र को न केवल समझा वरन इसे सफल बनाने के लिए अपने दिव्यक ज्ञान द्वारा ज्योवतिष शास्त्र में कई नियम प्रतिपादित किए। जिसे अपनाकर न केवल हम विवाह जैसी पवित्र परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं वरन अपने जीवन के वास्तिविक उद्देश्ये का भलीभांति निर्वहन भी कर सकते हैं। ज्योातिष शास्त्र ही वह अनमोल विज्ञान है जो आपको आपके भावी साथी की पूर्व व पूर्ण सूचना देता है। साथ ही आपके प्रारब्धी के अनुसार प्रदत्तच ग्रहीय व्यपवस्थाक के अनुरूप प्राप्तग होने वाले नकारात्मधक परिणामों से बचने का भी सर्वसुलभ मार्ग बताता है।
ज्योातिष के द्वारा विवाह में कुण्ड ली मिलान परम आवश्यथक माना जाता है। क्योंतकि संसार में जितने भी अप्रत्यडक्ष अदृष्टआ फल वाले शास्त्र। हैं। उनमें फल की सिद्धि को लेकर विवाद संभव है परन्तु ज्योततिष तो प्रत्येक्ष प्रमाणित शास्त्रि है। जिसकी सत्य ता का परिणाम स्व्यं सूर्य व चंद्रमा घूम-घूम कर सारे संसार को दे रहे हैं- किस स्थान पर कब सूर्योदय होगा और कब सूर्यास्त होगा। इसी तरह विवाह एक संयोग है जो धरती पर संपन्नो होता है। सोलह संस्काारों में विवाह एक महत्वापूर्ण संस्काैर है।
जब भी परिवार में विवाह की बात होती है तो कुण्ड ली मिलान प्रमुख दृष्टिकोण होता है। यह बात सच है कि जिसके साथ जीवन बिताना है उसे हम नहीं जानते तो कोई आधार तो होना ही चाहिए जिसके आधार पर हम निर्णय कर सकें कि उसके साथ हमारा जीवन ठीक-ठाक चल पाएगा या नहीं। इसीलिए कुण्डहली मिलान के द्वारा हम वर-कन्याा की रुचि, स्व भाव व आपसी सामंजस्यल पर विचार करते हैं। हिन्दूो धर्म में हमारे ऋषि-मुनियों ने ऐसी पद्धति खोज निकाली जिसके आधार पर हम वर-कन्याो के वैवाहिक जीवन के भविष्यध का अनुमान कुण्डसली मिलाकर लगा सकते हैं। यदि विवाह योग्य‍ लड़के-लड़की की जन्‍मतिथि, समय व स्थादन बिल्कु ल सही है और कुण्डकली मिलान करने वाला व्यथक्ति पूर्णरूपेण ज्योातिष शास्त्रह का ज्ञाता है तो निश्चित ही उनका विश्लेषण एवं सलाह सत्यय होगी।
कुण्डशली मिलान के समय दो पहलुओं पर विचार किया जाता है। प्रथम अण्ट कूट मिलान और दूसरा मांगलिक विचार। अण्टतकूट में वर्ण विचार, वश्या विचार, तारा विचार, योनि विचार, ग्रह मैत्री विचार, गण विचार, भृकूंट विचार एवं नाड़ीदोष का विचार किया जाता है। वर्ण के विचार के द्वारा वर के कर्मों पर विचार किया जाता है। वश्यर के द्वारा कौन किसके वश में होगा, यह विचार किया जाता है। तारा विचार के द्वारा वर-कन्याह के वैवाहिक जीवन के भाग्य का विचार किया जाता है। योनि विचार से वर-कन्याक के यौन संबंधों पर विचार किया जाता है। ग्रह मैत्री द्वारा वर-कन्या के पारस्पारिक संबंधों की जानकारी प्राप्ता होती है। ऐसे ही गण विचार के द्वारा वर-कन्यार की सामाजिकता, भृकूंट विचार से आपसी सामंजस्य् व नाड़ी विचार से वर-कन्याी की संतान का विचार व आयु के बारे में जानकारी मिलती है। अण्‍टकूट मिलान में 36 गुण होते हैं जिसमें से 18 गुणों का मिलान होना आवश्य क है जिसमें ग्रहमैत्री विशेष है। क्यों कि जब तक आपसी संबंध ठीक नहीं होंगे। तब तक वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रह सकता।
इसके अलावा मांगलिक विचार भी आवश्यीक है जिसमें कुण्डिली में मंगल के भाव की स्थिति पर विचार किया जाता है। यदि मंगल लग्न से 1,2,4,7,8,12वें भाव में स्थित हो तो वर या कन्यां को मांगलिक माना जाता है। लेकिन कुछ विशेष नियमों के अंतर्गत मांगलिक दोष भंग होने की स्थिति में कुण्डिली में चंद्र, सूर्य, शुक्र की क्या स्थिति है, इस पर विचार करके मांगलिक वर का गैर मांगलिक कन्या से भी विवाह संपन्न, किया जा सकता है।
यह लेखक के अपने विचार ह
ैं।

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