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शक्ति की आराधना का पर्व नवरात्र मंगलवार से परंपरागत से आस्था व श्रद्धा के साथ शुरू होगा। जिसकी पूर्णाहुति 23 अक्टूबर को होगी। 24 को विजयादशमी पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार नवरात्र के प्रथम दिन मंगलवार को सूर्योदय 6.17 बजे है और प्रतिपदा तिथि का मान सायंकाल 4.16 बजे तक है। चित्रा नक्षत्र पूर्वाह्न 9.05 बजे तक है। चित्र नक्षत्र या वैधृति योग होने पर कलश स्थापन का निषेध माना गया है। दुर्गोत्सव कात्यायन में कहा गया है- ‘त्वाष्ट्रं वैधृतियुक्तं चेत्प्रतिपच्चण्डिकार्चने। तयोरन्ते विधातव्यं कलश स्थापनं गृहे।।’ इसलिए दिन में 9.5 बजे के बाद व सूर्यास्त 5.43 के पहले कलश स्थापन किया जा सकता है। कलश स्थापन के लिए अभिजित मुहूर्त अत्यंत उत्तम माना जाता है। दिन में 11.37 बजे से 12.23 बजे तक अभिजित मुहूर्त है। रात्रि में कलश स्थापन नहीं किया जाता, ऐसा मत्स्य पुराण का मत है- ‘न रात्रौ कलश स्थापनं कार्य न च कुम्भाभिषेचनम्।’
देवी का आगमन व गमन विचार-
यदि नवरात्र रविवार या सोमवार से प्रारंभ होता है तो वाहन हाथी है और फल जलवृष्टि, यदि मंगलवार या शनिवार से प्रारंभ होता है तो वाहन घोड़ा है और फल राज्य भय, महंगाई व प्रजा में क्षोभ है। गुरुवार, शुक्रवार को प्रारंभ होने से वाहन झूला और फल प्रजाजनों में विग्रह, बुधवार को प्रारंभ होने से वाहन नौका व संपूर्ण अभीष्ट सिद्धियों को देने वाला होता है। देवी का गमन 24 अक्टूबर बुधवार को है, यह सुवृष्टि व प्रजा जनों को सुख देने वाला होगा।
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कैसे करें पूजन
प्रथम दिन पूजा गृह धोकर शुद्ध वस्त्र धारण कर मंडप में आएं और भगवती दुर्गा की प्रतिमा या पाटे पर लाल कपड़ा बिछाकर चित्र स्थापित करें। वहीं भगवती दुर्गा के लिए त्रिशूल आदि के चित्र का भी निर्माण करें। पूजा पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख करें। एक पाटे पर अपनी बार्इं ओर आधे में सफेद वस्त्र और दाहिने ओर आधे में लाल वस्त्र बिछावें। सफेद वस्त्र पर चावल की नौ कुड़ी नवग्रह की व लाल वस्त्र पर गेहूं की 16 कुड़ी का षोडश मातृका के लिए निर्माण करें एवं बीच में एक पात्र में चावल भरकर उसके ऊपर एक सुपारी में मौलि लपेटकर श्रीगणेशजी के रूप में उसे विराजमान कर दें। इसके बाद शुद्ध मिट्टी में गेहूं या जौ मिलाकर जवारा के लिए तैयार कर लें। यदि कलश पर मूर्ति विराजमान कर पूजा करनी हो तो वरुण कलश के अतिरिक्त एक कलश और स्थापित होगा। इस तरह एक या दो कलश में स्वस्तिक बनाकर उसके गले में मौलि बांधकर तैयार करें। गणपत्यादि देवों के पूजन के लिए एक दीपक एवं ज्योति देवी के पूजन के निमित्त अलग से एक दीपक में घी और रूई की बत्ती देकर तैयार कर लें। एक पात्र में पूजन सामग्री लेकर पूजन प्रारंभ करें।
पूजन सामग्री
गंगाजल, तीर्थजल, गाय का दूध, दही, घी, मधु, गुड़, यज्ञोपवीत, मौलि, चंदन, अक्षत, फूल, फूलमाला, दूर्वा, वेलपत्र, अबीर, गुलाल, रोली, सिन्दूर, हल्दी, सुहाग पेटी, अलंकार की वस्तुएं, इत्र, अगरबत्ती, रूई, तिल का तेल, पेड़ा, फल, पान का पत्ता, लौंग, इलायची, खड़ी सुपाड़ी व कपूर आदि।
प्रतिदिन का वैशिष्ट
प्रतिपदा को केश संस्कारक द्रव्य जैसे- आंवला, सुगन्धित तैल आदि, द्वितीया को बाल बांधने, गूंथने वाले रेशमी सूत, फीते आदि, तृतीया को सिन्दूर व दर्पण आदि, चतुर्थी को मधुपर्क, तिलक व नेत्रांजन, पंचमी को अंगराग, चंदनादि व आभूषण आदि, षष्ठी को पुष्प व पुष्पमालाएं आदि समर्पित करें।

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