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साधना का अर्थ ध्येय प्राप्ति के लिए सत्त प्रयास करना। इस प्रकार मंत्र साधना का अर्थ है मंत्र के माध्यम से ध्येय प्राप्ति के विविध व सत्त प्रयास करना। जब यह निश्चित हो जाता है कि आपका ध्येय क्या है तो उसको पाने के लिए गुरु इत्यादि से आवश्यक मंत्र प्राप्त करके उसके निर्देशन में विधिवत जप-पूजन , होम तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण भोजन इत्यादि कर्मों के लिए जो प्रयास किये जाते हैं उसे सामूहिक रुप से मंत्र साधना कहते है।
आर्चाय पं. शरद चन्द्र मिश्र का कहना है कि जब ध्येय की प्राप्ति हो जाती है तो उसे मंत्र की सिद्धि कहते हैं। मंत्र साधना के तीन मुख्य अंग हैं- नित्यकर्म,नैमित्तिक कर्म तथा काम्य कर्म। नित्य कर्म में प्रात: स्मरण, शौच, दन्त धावन, स्नान, सन्ध्या, नित्य पूजा, स्तोत्रपाठ इत्यादि सिम्मलित है। पं. मिश्र ने कहा कि विशेष प पर नैमित्तिक कर्म किये जाते हैं। पंच पर्व विशेष पर्व माने जाते हैं। वे हैं रात्रिव्यापिनी कृष्णाष्टमी, कृष्ण चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा व संक्रान्ति। इसके अतिरिक्त नवरात्र ग्रहप, रविपुष्प, गुरुकृपा इत्यादि भी विशेष पर्व माने जाते हैं। मंत्र साधना में इन पर्वों का विशेष महत्व होता है। यह माना जाता है कि इन पर्वों पर मंत्र जप इत्यादि कर्म शीध्र फलदायक होते हैं। कामनापूतिर् के लिए जो कर्म किये जाते हैं। वे काम्य कर्म कहलाते हैं। यद्यपि शस्त्रों में काम्य कर्म का निषेध किया जाता है। यह कहा जाता है निष्‍काम भाव से जो साधना की जाती है उससे सभी प्रकार की सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं फिर काम्य कर्म की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उन्होंने कहा कि मंत्र साधना में पुरश्चरण का भी विशेष महत्व है। पुरश्चरण विधान सामान्यत: मंत्रानुसार ग्रंथों में दिया जाता है। यह भी कहा गया है कि पूर्व जन्म के प्रतिबंधक पापों से एक बार पुरश्चरण करने पर मंत्र सिद्ध न हो तो दूसरी बार पुरश्चरण करना चाहिए। ऐसा मंत्र महोदधि में लिखा है। मंत्र साधना से जब मंत्र सिद्ध हो जाता है तो साधक को उसके लक्षण दिखाई देते हैं। मंत्र सिद्धि के उपरान्त भी कतिपय कर्तव्य करते रहने चाहिए। साधक को ज्ञान प्राप्ति के लिए जप की संख्या निरन्तर बढ़ानी चाहिए। जब वेदान्त प्रातिपादित ततवों का ज्ञान प्राप्त हो जाय , तब साधक कृतार्थ हो जाता है और संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है।

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