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महाष्टमी व्रत व महानिशा पूजा 22 अक्टूबर को हैा
नवरात्र में महाष्टमी कालरात्रि के रूप में जानी जाती है। इस तिथि पर निशा काल (मध्य रात्रि) में देवी कालरात्रि के पूजन का विशेष महत्व है। वाम मार्ग में इस रात्रि को बलि का विधान है। बलि अर्थात अपने प्रिय से प्रिय वस्तु का समर्पण। शास्त्रों के अनुसार अष्टमी जिस दिन मध्य रात्रि में प्राप्त हो उसी दिन रात को महानिशा पूजा की जाती है।
ज्योतिषी डॉ. जोखन पाण्डेय शास्त्री व पं. शरदचंद्र मिश्रा की मानें तो ‘दुर्गोत्सव भक्ति तरंगिणी’ व ‘देवी पुराण’ के अनुसार देवी उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ तिथि है महाष्टमी। इसी दिन रात को महानिशा पूजा की जाती है। 22 अक्टूबर को महाष्टमी व्रत है। इस दिन सूर्योदय 06.21 बजे और अष्टमी रात्रि 12.45 बजे तक है।
ज्योतिषियों का कहना है कि बलि का अर्थ पशुबलि से नहीं है। दुर्गा सप्तशती के रहस्य में भगवती ने स्वयं ब्राह्मणों द्वारा बलि पूजा का निषेध किया है- ‘बलिमांसांदि पूजेयं विप्रवर्णामयेरिता’। इन्हें केवल गंध (चंदन), अक्षत, फूल आदि से पूजा करने के लिए कहा गया है। ब्राह्मणों के एक विशेष वर्ग में कुछ दिन पूर्व तक बलि पूजा की प्रथा थी, लेकिन अब वह वर्ग भी बलि के रूप में जायफल, नारियल, कूष्माण्ड भतुआ), उड़द-दही-चावल आदि का प्रयोग करता है। सात्विक उपासकों ने बलि के प्रतीक के रूप में इन वस्तुओं का विधान बताया है। भगवान स्वयं इस पद्धति को सर्वोत्तम मार्ग बताते हैं। आद्यजगद्गुरु शंकराचार्य ने अपने विभिन्न व्याख्यानों व पुस्तक ‘सौन्दर्य लहरी’ में वाम मार्ग की इस पूजा पद्धति (पशु बलि) की निंदा की है।
पूर्वांचल में इस दिन महिलाएं लप्सी (हलुआ) व पूड़ी बनाकर देवी को धार चढ़ाती हैं। बहुत से घरों में इस दिन भोजन नहीं बनता है, उसे ही बलि प्रसाद के प्रतीक रूप में ग्रहण किया जाता है। इसी दिन भवानी की उत्पत्ति भी मानी गयी है। भगवती अन्नपूर्णा की पूजा व उनकी परिक्रमा का इस दिन विशेष महत्व है। इस दिन अन्नपूर्णा के पूजन से घर में कभी धन धान्य की कमी नहीं रहती है।

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