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नवरात्र नौ शक्तियों से युक्त है। मां की अभ्‍यर्थना का यह सबसे उत्तम समय है। इस दौरान पूजा-पाठ, व्रत आदि करने से शक्ति तो प्राप्त होती ही है, मां की अनुकंपा भी बरसती रहती है।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार शारदीय नवरात्र, विजयादशमी व शरत्पूर्णिमा, ये तीनों पर्व परस्पर सूत्र में आबद्ध हैं। अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शरत्पूर्णिमा तक को शास्त्रों में देवी पक्ष कहा गया है। नवरात्र सामान्यत: चार हैं- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक, अषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक, अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक तथा माघ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक। इन चारों में वासंतिक नवरात्र चैत्र में तथा शारदीय नवरात्र अश्विन में पड़ते हैं, ये दोनों नवरात्र अति प्रसिद्ध हैं। शेष दो नवरात्रों में भी शक्तिपीठों पर पूजा-अर्चना होती है। वासंतिक नवरात्र को शयनाठ्य व शारदीय नवरात्र को बोधनाठ्य कहते हैं। ‘रूद्रयामल’ में कहा गया है- ‘नौ शक्ति समायुक्ता नवरात्रं तदुच्यते’ । अर्थात नौ शक्तियों से युक्त होने के कारण इन नौ दिनों को नवरात्र कहा गया है। शयनाठ्य वासंतिक नवरात्र से बोधानाठ्य शारदीय नवरात्र अधिक प्रशस्त व व्यापक माना जाता है। ‘बृहत्सारसिद्धान्त’ में लिखा है- अश्विनस्य सिते पक्षे नानाविध महोत्सवै:। प्रसादयेयु: श्रीदुर्गां चतुर्वर्ग फालर्थिन:।। अर्थात अश्विन शुक्ल पक्ष में विशेष महोत्सवों से दुर्गाजी की पूजा धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष, ये चारो फल देने वाली है।

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