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नवरात्र में सप्तमी तिथि को मृतिका मूर्तियों की स्थापना की जाती है। परन्तु ‘वीर मित्रोदय’ के अनुसार मूर्तियों की स्थापना मूल नक्षत्र में की जाय और विसर्जन श्रवण नक्षत्र में- मूले देवीं स्थापयेत श्रवणे विसर्जनं च। परन्तु प्रचलित परंपरा में सप्तमी तिथि को स्थापना की जाती है। सप्तमी इस नवरात्र में 21 अक्टूबर को है।
महाष्टमी विचार- अश्विन शुक्ल अष्टमी 22 अक्टूबर दिन सोमवार को है। इस दिन सूर्योदय 6.21 बजे और अष्टमी तिथि का मान 46 दंड 1 पला अर्थात रात्रि 12.45 बजे तक है। महाष्टमी के दिन देवी उपासना के अनेक अनुष्ठान होते हैं। इसमें सप्तमी का वेध वर्जित और नवमी का ग्राह्य होता है। इस दिन देवी शक्ति धारण करती हैं। महाष्टमी को प्रात:काल पवित्र होकर भगवती की वस्त्र, छत्र, चामर और राजचिन्हादि से पूजा की जानी चाहिए। इस दिन ‘अखिलकारिणी देवी’ की पूजा की जाती है। इस दिन विशिष्ट पूजा सायंकाल करें और अर्धरात्रि में देवी के लिए बलि प्रदान करें। इस दिन देवी के त्रिशूल की पूजा अवश्य करें।
महानवमी विचार- महानवमी 23 अक्टूबर को है। व्रत की परिपूर्णता के लिए इस दिन हवन किया जाता है। हवन के पूर्व कुमारी व बटुक का पूजन करें। इस दिन सूर्योदय 6.22 बजे और नवमी तिथि का मान 42 दंड 22 पला अर्थात रात्रि 11.19 बजे तक है। इसलिए सूर्योदय से रात्रि 11.19 बजे तक हवन किया जा सकता है। हवन नवार्ण मंत्र- ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे या ऊं दुर्गा देव्यै स्वाहा या दुर्गा सप्तशती के श्लोकों से किया जा सकता है। हेमाद्रि व देवी भागवत के अनुसार अश्विन शुक्ल नवमी को प्रात: स्नानादि नित्यकर्म समाप्त कर ‘उपोष्य नवमीं त्वद्य यामेष्वष्टसु चण्डिके। तेन प्रीता भव त्वं भे: संसारात त्राहि मां सदा।।’ इस मंत्र से व्रत करने की भावना भगवती के सम्मुख निवेदित करें। उसके बाद देवी पूजा के स्थान को ध्वजा, पताका, पुष्पमाला और वंदनवार इत्यादि से सुशोभित करके भगवती का सम्यक पूजन करें। अनेक प्रकार के अन्न, पकवान्न का भोग लगावें और घी से पूर्ण बाती या कपूर जलाकर नीराजन करें।
हवनीय द्रव्य- हवन में तिल, घी, गुड़, पंचमेवा, जटामासी, गूगुल, अगर-तगर, केशर, कस्तूरी, गोरोचन, सुगन्धबाला, सुगन्ध कोकिला, गन्ने का टुकड़ा, कमलबीज, बेल की गुद्दी, गुरुच और औषधियों को उत्तम माना गया है। खीर का हवन भी किया जाता है। हवन के लिए बेल की लकड़ी (समिधा) उत्तम मानी जाती है।
हवन के अनंतर- हवन के बीच में देवी का उत्तर पूजन किया जाय और आरती के बाद प्रार्थना करें- महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्ड मालिनी। आयुरारोग्यमैश्वर्यं देहि देवि नमोस्तुते।। पुन: हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि श्री गणेशजी, लक्ष्मी जी, ऋद्धि-सिद्धि सहित कुबेर जी लाभ, शुभ, सत्य व धर्म घर में विराजमान रहें और सभी आवाहित देव अपने अपने स्थान को पधारें।


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