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शारदीय नवरात्र व्रत की पूर्णाहुति 22 अक्टू बर दिन मंगलवार को हवन व कन्या पूजन के साथ होगी। नौ दिन व्रत रहने वाले श्रद्धालुओं का इस दिन अंतिम व्रत होगा। जिन श्रद्धालुओं ने प्रति दिन कुमारी पूजन नहीं किया है वे इस दिन 9, 7, 5, 3 या 1 कन्या का अवश्य पूजन करें।
ज्योतिषी पं. शरदचंद्र मिश्र ने कहा कि देवी पूजन के महात्म्य के संबंध में देवीभागवत में कहा गया है कि जो मनुष्य सुगन्धित पुष्प और जल से देवी का पूजन करता है वह विष्णु लोक में पूजित होता है। जो घी अर्पण करता है वह अपने 10 पूर्व के तथा 10 परा पुरुषों का उद्धार करता है और दुर्गा लोक में प्रतिष्ठित होता है। भविष्य पुराण में लिखा है- जो नवमी के दिन गन्ने के रस से देवी को स्नान कराता है उसके पितृगण एक हजार वर्ष तक तृप्त रहते हैं। नवमी के दिन 16 उपचारों में द्वादशांग अर्घ्य से जो पूजन करता है वह 10 हजार वर्ष तक स्वर्ग लोक में निवास करता है। विष्णु धर्मोत्तर ग्रंथ में लिखा है कि पापी भी यदि नवमी के दिन देवी का ध्वज लगाता है तो उसके संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। नवमी को निवास स्थान के पूर्व भाग में भद्रकाली की स्थापना कर गंध, पुष्पादि से भी पूजन का विधान है।
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द्वादशांग अर्घ्य के फल
जल, दूध, कुश, अक्षत, दही, सहदेवी (सहदेइया), जौ, कुंकम, रोचन, मधु, घृत व मिष्ठान का अर्घ्य मिट्टी के पात्र में देने पर बाजपेय यज्ञ का फल, ताम्रपत्र में देने से पुण्डरीक यज्ञ का फल, स्वर्ण पात्र में देने से समस्त कामनाओं की पूर्णता, चांदी के पात्र में देने से आयु व राज्यफल, पलास या कमल पत्ते के दोना में देने से एक हजार गोदान का फल प्राप्त होता है।

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हवन समय
नवमी के दिन मंगलवार को सूर्योदय 6.22 बजे और नवमी तिथि का मान 42 दंड 22 पला अर्थात रात्रि 11.19 बजे तक है। अर्थात हवन सूर्योदय से लेकर रात 11.19 बजे तक कभी किया जा सकता है। हवन घृत, काला तिल, मीठा, पंचमेवा, ईख का टुकड़ा, बेल की गुद्दी, गुरुच, अगर-तगर, केशर-कस्तूरी, सुगन्धबाला इत्यादि से करनी चाहिए। ये उपलब्ध न हों तो केवल खीर से ही हवन संपन्न किया जा सकता है। हवन दुर्गा सप्तशती के प्रति श्लोक या नवार्ण मंत्र से की जानी चाहिए। इसके बाद क्षमा प्रार्थना कर भगवती को विदा करना चाहिए।

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