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शरद पूर्णिमा २९ की रात आसमान से अमृत की वर्षा होगी। शास्त्र ऐसा कहते हैं। इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के उदित होकर अपनी किरणों से अमृत वर्षा करता है। इस पूर्णिमा को कौमुदी पूर्णिमा भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी रात महारास की लीला की थी, इसलिए इस इस पूर्णिमा को रासपूर्णिमा भी कहा जाता है।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी इस रात को भ्रमण करती हैं और रात्रि जागरण करने वाले भक्तों को धन व संपूर्ण वैभव प्रदान करती हैं। शरद पूर्णिमा के दिन व्रत व विधिवत पूजा-अर्चना करने से भी प्रकार के दु:खों से छुटकारा मिलता है तथा अभीष्ट की प्राप्ति होती है। अभाव घर से भागता है और समृद्धि का निवास होता है। इस रात को चांद चांदनी के माध्यम से धरती पर अमृत की बूंदे टपकाता है। इस दिन तांबे या मिट्टी के कलश पर माता लक्ष्मी या अपने इष्टदेव की मूर्ति रखकर, सुन्दर वस्त्र व आभूषणों से श्रृंगार कर उपवास का संकल्प लेकर षोडसोपचार पूजन किया जाता है। इसके बाद चंद्रोदय होने पर घी के एक सौ दीपक प्रज्जवलित करके रखे जाते हैं। इस दिन घी मिश्रित दूध की खीर बनाकर इसे विभिन्न पात्रों में भरकर चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है। रात्रि के तीन प्रहर बीतने पर संपूर्ण खीर लक्ष्मीजी को अर्पित की जाती है। फिर भगवत भजनों के साथ रात्रि जागरण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि मध्य रात्रि के बाद चंद्रमा अमृत वर्षा करता है, जिससे चांदनी में रखी खीर अमृतमय हो जाती है। यह दीर्घायु व अरोग्यता प्रदान करती है।
देश के अनेक अंचलों में घर के आंगन को साफ-सुथरा करने के बाद चावल के आटे के लेप से सजाया-संवारा जाता है। फिर घर के सभी देवताओं के विग्रह को वहां सजाने के बाद खीर के साथ ही पान, मखाना, बताशा, फल इत्यादि का भोग लगाकर पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद खीर चांदनी में रखी जाती है। दूसरे दिन खीर का सभी लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं।
इस दिन कांसे के पात्र में घी भरकर दान करने से ब्राह्मण ओजस्वी होता है। अपराह्न में हाथियों का निराजन (आरती) किया जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए श्रीसूक्त व लक्ष्मी स्त्रोत का पाठ किया जाता है।

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  1. बहुत सराहनीय जानकारी दी है आपने.शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

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  2. अहं. अलग सी जानकारी.

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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