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इस लेख को पढ़ने के एक प्रयोगधर्मी मन की आवश्‍यकता हैा यह लेख सिर्फ आकर्षण के लिए नहीं लिखा जा रहा हैा इसे कोई यूटोपिया ना समझे, यह लेख अमरत्‍व के विज्ञान में प्रवेश करने का एक प्रयास हैा इस प्रयास में हम प्रमाण नहीं हैां एक यात्री हैां यह एक शोध का कदम है, जरूरी नहीं कि हमारा यह जन्‍म पर्याप्‍त हो, हमारा यह शरीर पर्याप्‍त प्रयोग शास्‍त्र होा हमारी सारी सोच, हमारी पूरी मानव सभ्‍यता निरंतर नश्‍वरता की सोच हैा मृत्‍यु की तरफ ले जाने वाली नौका हैा अमरता का शब्‍द कोई काल्‍पनिक शब्‍द नहीं हैा वैदिक काल से पौराणिक काल तक ऐसे मनीषियों का अभाव न था जिन्‍होंने इस शब्‍द को सार्थक न किया होा वर्तमान भौतिकवादी युग में यह शब्‍द कुछ काल्‍पनिक सा, यूटोपिया सा लगता हैा असल में यह विषय आध्‍यात्मिक रहस्‍यवाद का हिस्‍सा हैा हजारों साल से यह रहस्‍यवाद हमारी यात्रा का विषय नहीं हैा यह पहाड़ों व कंदाराओं में रहने वाले वैज्ञानिक योगियों का विषय हैा मैं आपका ध्‍यान आकर्षित करना चाहता हूं कि आपके चेतना के तल पर यह विषय यूटोपिया ना बनकर चिंतन का विषय बन जाया आध्यात्मिक योगियों के विषय में लिखी हुई एक अद्भुत पुस्तक है- योगी कथामृत। यह पुस्तक अमरत्व के विज्ञान की तरफ बार-बार इशारा करती है। इस पुस्तक में एक अद्भुत योगी का जीवन वृत्त है, जिन्हें महाअवतार बाबा के नाम से जाना जाता है। बाबाजी अमरत्व की महानतम मिसाल हैं। आज भी हिमालय में लगभग दो हजार साल के बाबाजी 25 वर्ष के युवा सदृश्य दिखते हैं। बाबाजी महानतम गुरु श्यामचरण लाहिड़ी महाशय के सद्गुरु हैं। स्वामी योगानंद इस पुस्तक इस दुर्लभ महायोगी के बारे में कुछ दुर्लभ पंक्तियां लिखकर अमरत्व के सिद्धान्त को प्रमाणित किया है। वास्तव में जीवन में सत्य एक ऐसा संतुलन है, एक ऐसे अनुशासन का प्रवाह है जिसमें कोई कोशिका अपने क्षय को प्राप्त नहीं होती। हमारी कोशिकाओं के क्षरण की प्रक्रिया हमारे मन के नकारात्‍मक तरंगों के कारण उत्‍पन्‍न होती हैा हमारे मन को तरंगायित होने के लिए शक्ति की जरूरत पड़ती हैा यह शक्ति कोशिकाओं के क्षरण का कारण बनती हैा हमारे पूरे मानव मन ने मृत्‍यु को स्‍वीकार कर लिया है, इसलिए हम इस स्‍वीकार के सामुदायिक आत्‍मसम्‍मोहन से गुजर रहे हैंा हमारे अवचेतन में कम्‍प्‍यूटर के इनपुट की तरह प्रोग्राम फीड कर दिया गया है, अपने आउटपुट में हमने जीवन को एक सीमा में बांध लिया हैा अब प्रकृति का सुपर कम्‍प्‍यूटर हमारी इस इच्‍छा को पूरा करने के लिए निरंतर काम कर रहा हैा वह सुपर कम्‍प्‍यूटर निरंतर हमारे शरीर के बायोकेमिस्‍टी को तैयार कर रहा है कि हमारी नियति क्‍या है और हमारी कोशिकाओं के निष्क्रिय होने की अवधि क्‍या हैा
हमारी धारणाएं हजारों साल से चट्टान की भांति खड़ी हैंा इन धारणाओं में जुदाई, क्षय व मृत्‍यु के गीत ही मनुष्‍य के जीवन में एक तरल की भांति यात्रा कर रहा हैा पिछले तीस वर्ष की खोजों ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि बुढ़ापा, उम्र ढ़लना, यह सब मन के तल पर ही घटित होता हैा हमारा मन अत्‍यंत सामर्थ्‍यवान हैा हमारा शरीर व कोशिकाएं इसकी गुलाम हैं, जो प्रतिक्षण इसके कारण प्रभावित हो रही हैंा शरीर क्षय के अनंत प्रवाह के कोशिकाओं के क्षरण को रोका जा सकता है उसके एकमात्र मालिक मन को नियंत्रित करकेा दुनिया की सारी साधनाएं मन का नियंत्रण ही तो हैंा
मन का नियंत्रण होगा कैसे, इसके दो सोपान हैंा पहला सोपान है कि हम जागतिक संबंधों से पूर्णतया बाहर हो जायं और दूसरा सोपान है कि हम जगत में रहकर ही जागतिक खेल से बाहर हो जायं, इन दोनों सोपानों की आधारशिला है वैराग्‍या मनुष्‍य चाहे जितनी साधनाएं कर ले लेकिन वैराग्‍य या वीतराग के बिना मन की यात्रा नहीं रुक सकतीा किसी भी श्रेष्‍ठ साधना के लिए यदि आप ईमानदार हैं तो मन व वैराग्‍य को समझना होगाा वैराग्‍य कोई ऐसी वस्‍तु नहीं जो जंगलों या पहाड़ों में पलायन करने से प्राप्‍त होती हैा यह पलायन एक प्रयोग है कि हम जागतिक संबंधों से पूर्णतया बाहर हो जायंा यह प्रयोग असफल भी हो सकता हैा जंगलों व पहाड़ों में भटकने वाले तमाम साधु इसके उदाहरण हैंा अमीवा तो प्रकृति का दिया हुआ एक स्‍वयंसिद्ध उदाहरण हैा अमीवा के अमरत्‍व के सूक्ष्‍म बिन्‍दुओं तक पहुंचने के लिए हमें या तो सूक्ष्‍म आध्‍यात्मिक रहस्‍यवाद से गुजरना होगा या तो अनंत काल तक चलने वाले वैज्ञानिक प्रयोगों से गुजरना होगाा हमें विश्‍वास है कि मन की यात्रा सर्वसुलभ हो लेकिन मन क्‍या है, वैराग्‍य क्‍या है, कैसे आएगा, इसके लिए हमें योग के आध्‍यात्मिक पक्ष से गुजरना होगा जो हमें अमरत्‍व के अमृत रस का पान करा सकता हैा इस लेख के अगले अंक में हम पुन: आपसे आत्‍मकेन्द्रित होंगेा
यह लेखक के अपने विचार हैं

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  1. Autobiography of a yogi (yogi kathamrit in hindi) was the first book that actually introduced me to elements of Indian philosophy and spirituality. To date, it is my most favourite book.

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