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अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कान) की जमीन गोरखपुर में तैयार हुई थी। गीता वाटिका गोरखपुर के संस्थापक भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार की मदद से इस्कान बना और पूरी दुनिया में फैलकर आज कृष्ण भक्ति का प्रसार कर रहा है। पूरे विश्व में इस संघ के 500 से ज्यादा मंदिर व गुरुकुल हैं। इस संघ को गोरखपुर से जो ऊर्जा मिली उसने विश्व के उन लोगों को भी सन्मार्ग की राह दिखाई जिन्होंने भोग-विलास को ही जीवन का चरम लक्ष्य मान लिया था।
अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ के संस्थापक श्रील प्रभुपाद काफी दिनों से कृष्ण भावना का संदेश पूरी दुनिया में प्रसारित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इसी क्रम में 1962 में वह गोरखपुर आए। यहां गीता वाटिका के संस्थापक नित्यलीलालीन गृहस्थ संत भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार से उनकी मुलाकात हुई। उन्होंने डालमिया ट्रस्ट के जरिए श्रील प्रभुपाद की पुस्तक श्रीमद्भागवत को प्रकाशित कराने के लिए आर्थिक मदद की। गीता वाटिका में सोमवार से शुरू हुए गीता ज्ञान यज्ञ में पधारे प्रभुपाद के शिष्य कनाडा निवासी स्वामी प्रभु अक्रूर दास उक्त जानकारी देते हुए कहते हैं कि यह बहुत महत्वपूर्ण संयोग था। यदि वह पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई होती तो शायद कृष्ण भावना का प्रचार-प्रसार आज इतनी तेजी से नहीं हो पाता। भाईजी की सहायता से ही कृष्ण भावना का फाउण्डेशन बन पाया। जो आज पूरी दुनिया में कृष्ण भावना का परचम लहरा रहा है। गोरखपुर में प्रभुपाद जी तीन माह रहे। यहां के कई लोगों के घरों में उन्होंने श्रीकृष्ण संकीर्तन किया था। इसके तीन साल बाद 1965 में वह बाहर की यात्रा पर निकले। 69 वर्ष की उम्र में भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा व अपने गुरु के आदेशों का पालन करते हुए वैदिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने के लिए हरिनाम का संदेश लेकर एक मालवाहक जहाज जलदूत द्वारा यात्रा कर 1965 में संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचे। अमेरिका जैसे अतिभौतिकवादी देश में जहां हिप्पी लोगों का साम्राज्य था, जो भोग-विलास में अपना जीवन बर्बाद कर चुके थे, ऐसे युवा हिप्पियों को अपनी शुद्धि भक्ति द्वारा श्रील प्रभुपाद ने सन्मार्ग पर लाया। इसके बाद पाश्चात्य देशों में कृष्ण भक्ति की बाढ़ सी आ गई। 1966 की जुलाई में सर्वप्रथम न्यूयार्क में श्रील प्रभुपाद ने संपूर्ण विश्व को व्याप्त करने वाले एक आध्यात्मिक संघ की स्थापना की। इसे उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (इस्कान) नाम दिया। इसके बाद दुबारा वह पुन: 1971 में भी गोरखपुर आए थे। 1965 से 1977 के बीच उन्होंने विश्व में 108 मंदिरों की स्थापना की तथा कृष्ण भक्ति आंदोलन को गति देने के लिए उन्होंने विश्व का चौदह बार भ्रमण किया। आज उनके अनुयायियों की संख्या करोड़ों में है।

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