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और तुम पाओगे, तुम्हारा प्रेम इस मुक्ति में बढ़ेगा, फलेगा, गहरा होगा। और जल्दी ही तुम दोनों ही ध्यान की तरफ अपने आप आकर्षित हो जाओगे
मैं दुनिया से विवाह को विदा कर देना चाहता हूं। और उसका कारण तुम जान कर चकित होओगे। उसका कारण यह है कि अगर दुनिया से विवाह विदा हो जाए, तो इस दुनिया को धार्मिक होने के लिए रास्ता खुल जाए। विवाह के कारण यह भ्रांति बनी रहती है कि इस स्त्री में मैं उलझा हूं, इससे फंसा हूं, इसलिए वासना तृप्त नहीं हो रही! काश मुझे मौका होता, इतनी सुंदर स्त्रियां चारों तरफ घूम रही हैं, तो कब की वासना तृप्त हो गई होती।
वह भ्रांति है। मगर वह भ्रांति बनी रहती है विवाह के कारण। दूसरे की स्त्री सुंदर मालूम पड़ती है। दूसरे के बगीचे की घास हरी मालूम पड़ती है। और दूसरे की स्त्री जब घर से बाहर निकलती है, तो बन-ठन कर निकलती है, तुम्हें तो उसका बाहरी आवरण दिखाई पड़ता है। तुम्हारी स्त्री भी दूसरे को सुंदर मालूम पड़ती है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन घर आया और उसने देखा कि चंदूलाल मारवाड़ी उसकी पत्नी को आलिंगन कर रहा है। वह एकदम ठिठका खड़ा रह गया। चंदूलाल बहुत घबड़ाया। चंदूलाल ने समझा कि मुल्ला एकदम गुस्से में आ जाएगा, बंदूक उठा लेगा!
लेकिन न उसने बंदूक उठाई, न गुस्से में आया। चंदूलाल के कंधे पर धीरे से हाथ मारा और कहा, जरा मेरे पास आओ। बगल के कमरे में ले गया और बोला, मेरे भाई, मुझे तो करना पड़ता है, तुम क्यों कर रहे हो? तुम्हें क्या हो गया? तुम्हारी बुद्धि मारी गई है? मेरी तो मजबूरी है, क्योंकि मेरी पत्नी है। सो रोज मुझे आलिंगन भी करना पड़ता है और रोज कहना भी पड़ता है कि मैं तुझे बहुत प्रेम करता हूं। बस तुझे ही चाहता हूं, जी-जान से तुझे चाहता हूं मेरी जान, जनम-जनम तुझे चाहूंगा। मगर तुझे क्या हो गया मूरख? और हमने तो सुना था कि मारवाड़ी बड़े होशियार होते हैं। मगर नहीं, तू निपट गधा है। और तेरी जैसी सुंदर पत्नी को छोड़ कर तू यहां क्या कर रहा है? अरे मूरख, मैं तेरी पत्नी के पास से चला आ रहा हूं।
चंदूलाल ने कहा कि भैया, तूने मुझे भी मात कर दिया। उस औरत के डर से मैं कहां-कहां नहीं भागा फिरता हूं! शराब पीता हूं, फालतू दफ्तर में बैठा रहता हूं, फिजूल ताश खेलता हूं, शतरंज बिछाए रखता हूं कि जितनी देर बच जाऊं उस चुड़ैल से उतना अच्छा! तू उसके पास से चला आ रहा है! कहते क्या हो नसरुद्दीन? मैं तो सदा सोचता था कि तुम एक बुद्धिमान आदमी हो। तुमने उसमें क्या देखा? उस मोटी थुलथुल औरत में तुमको क्या दिखाई पड़ता है? एक दिन स्टेशन पर वजन तुलने की मशीन पर चढ़ी थी, तो मशीन में से आवाज आई: एक बार में एक, दो नहीं। तुम्हें उसमें क्या दिखाई पड़ रहा है?
मगर यही होता है। विवाह ने एक भ्रांति पैदा कर दी है। विवाह ने खूब धोखा पैदा कर दिया है। विवाह से ज्यादा अधार्मिक कृत्य दूसरा नहीं है, मगर धर्म के नाम पर चल रहा है! अगर लोग मुक्त हों, तो जल्दी ही यह बात उनकी समझ में आ जाए कि न तो कोई पुरुष किसी स्त्री की वासना तृप्त कर सकता है, न कोई स्त्री किसी पुरुष की वासना तृप्त कर सकती है। लेकिन यह अनुभव से ही समझ में आ सकता है। जब एक से ही बंधे रहोगे तो यह कैसे समझ में आएगा?
और जिस दिन यह समझ में आ जाता है, उस दिन जीवन में ध्यान की शुरुआत है। उसी दिन जीवन में क्रांति है। उसी दिन तुम वासना के पार उठना शुरू होते हो। ध्यान है क्या? ध्यान यही है कि मन सिर्फ दौड़ता है, भरमाता है, भटकाता है मृग-मरीचिकाओं में—और आगे, और आगे...। क्षितिज की तरह, ऐसा लगता है—अब तृप्ति, अब तृप्ति, जरा और चलना है; थोड़े और! और क्षितिज कभी आता नहीं, मौत आ जाती है। तृप्ति आती नहीं, कब्र आ जाती है। ध्यान इस बात की सूझ है कि इस दौड़ से कुछ भी नहीं होगा। ठहरना है, मन के पार जाना है, मन के साक्षी बनना है।
अगर सच में ही चाहते हो कि वासना से तृप्ति, मुक्ति, वासना के जाल से छुटकारा हो जाए, तो न तुम्हारी पत्नी दे सकी है, न किसी और की पत्नी दे सकेगी, न कोई वेश्या दे सकेगी, कोई भी नहीं दे सकता है। यह कृत्य तो तुम्हारे भीतर घटेगा। यह महान अनुभव तो तुम्हारे भीतर शांत, मौन, शून्य होने में ही संभव हो पाता है।

मगर जब तक यह न हो, तब तक मैं दमन के पक्ष में नहीं हूं। मैं कहता हूं, तब तक जीवन को जीओ, भोगो। उसके कष्ट भी हैं, उसके क्षणभंगुर सुख भी हैं; कांटे भी हैं, फूल भी हैं वहां; दिन भी हैं और रातें भी हैं वहां—उन सबको भोगो। उसी भोग से आदमी पकता है। और उसी पकने से, उसी प्रौढ़ता से, एक दिन छलांग लगती है ध्यान में।
अपनी पत्नी को भी कहो कि सच्चाई क्या है। उससे भी पूछो कि उसकी सच्चाई क्या है। जिनसे हम जुड़े हैं, कम से कम उनके प्रति हमें प्रामाणिक होना चाहिए, आथेंटिक होना चाहिए। और उनको भी मौका देना चाहिए कि वे प्रामाणिक हों। प्रेम का पहला लक्षण यह है कि जिससे हमारा प्रेम का नाता है, उसके साथ हमारी प्रामाणिकता होगी; हम उससे सत्य कहेंगे। और सत्य शुरू में चाहे कितना ही कड़वा मालूम पड़े, पीछे सदा मीठा है।
बुद्ध ने कहा है: झूठ पहले मीठा, पीछे जहर। और सत्य पहले कड़वा, फिर पीछे अमृत।
सत्य से मत डिगना, किसी कीमत पर मत डिगना, कोई समझौता सत्य के संबंध में मत करना। और अपने सत्य को जीना, क्योंकि यह जीवन तुम्हारा है, तुम्हारी पत्नी का नहीं। और पत्नी का जीवन उसका है, तुम्हारा नहीं। दोनों जीओ। दोनों अनुभव करो। दोनों पहचानो। दोनों परखो। और धीरे-धीरे तुम पाओगे कि जब तक वासना है, तब तक हम बचकाने हैं, तब तक हमारे जीवन में प्रौढ़ता नहीं है।
मगर हम बचकाने रह जाते हैं। उसका कारण है। हमको अनुभव ही नहीं करने दिया जाता। अनुभव के बिना कोई कभी प्रौढ़ नहीं होता। उम्र तो बढ़ जाती है, मगर मन बचकाना रह जाता है। पहले महायुद्ध में पहली बार मनोवैज्ञानिकों को यह पता चला कि आदमी की औसत उम्र बारह साल है। पहली दफा बड़े पैमाने पर इस बात की जांच-पड़ताल की गई कि लोगों की मानसिक उम्र क्या है? तो बहुत हैरानी की बात थी, चकित हो जाने वाली बात थी—अस्सी साल के बूढ़े की भी उम्र बारह साल है! मानसिक उम्र इससे ज्यादा नहीं बढ़ पाती।

यह बड़ी दुर्घटना है। तो फिर खेल-खिलौनों में हमारा रस रहता है। और इसको हम दमन करते जाएं, तो फिर वह रस हमारा जाएगा नहीं, वह बना ही रहेगा। फिर हम क्या-क्या तरकीबें नहीं निकालते! फिर अश्लील साहित्य है, पोर्नोग्राफी की किताबें हैं, पत्रिकाएं हैं—गंदी, बेहूदी। गीता में और बाइबिल में छिपा कर लोग प्लेबॉय देख रहे हैं। किसी को पता भी न चल जाए! अश्लील फिल्में हैं। घरों में छिप-छिप कर लोग, मित्रों को इकट्ठा कर-कर के अश्लील और नंगी फिल्में देख रहे हैं। यात्राओं पर लोग जाते हैं, नाम होता है व्यवसाय का, लेकिन मामला होता है केवल वेश्याओं का। काम नहीं भी होता, तो भी टिके रहते हैं व्यवसाय के लिए।

एक व्यक्ति कलकत्ता से बंबई आया। आया था तीन दिन के लिए, तीन सप्ताह बीत गए। तार भेजता रहे कि खरीद कर रहा हूं, खरीद कर रहा हूं, अभी खरीद जारी है।
जब तीन महीने बीतने लगे...शंकित तो पत्नी पहले ही से हो गई थी। पत्नी शंकित तो पहले ही से होती हैं। कोई शंकित होने के लिए कारण की जरूरत नहीं होती। विवाह पर्याप्त है शंका के लिए। विवाह इतना अप्राकृतिक है, इसलिए शंका बिलकुल स्वाभाविक है। इसलिए पत्नियों को कारण खोजने की जरूरत नहीं पड़ती, शंका तो रहती ही है, कारण तो फिर अपने आप मिल जाते हैं। कारण तो मिल ही जाएंगे। मिलने ही चाहिए। कारणों के संबंध में पत्नियां निश्चित रहती हैं कि वे तो खोज लिए जाएंगे, उसमें कोई अड़चन नहीं है, देर-अबेर की बात है। क्योंकि विवाह की संस्था इतनी अप्राकृतिक है।
शंकित तो थी ही, तीन महीने बाद उसने भी तार किया कि अब ठीक है, तुम खरीद जारी रखो। तुम जो वहां खरीद रहे हो, मैंने यहां बेचना शुरू कर दिया है।
वह आदमी भागा हुआ घर आया। क्योंकि वह जो खरीद रहा था, अगर वही बेचना शुरू कर दिया है, तो मारे गए।
पत्नी ने कहा, कैसे जल्दी से आ गए अब? खरीद नहीं करनी? कब तक खरीदोगे तुम, फिर मैं बेचूंगी भी यहां। वही, जो तुम खरीदोगे, वही यहां बेचूंगी। खरीद-खरीद कर इकट्ठा करते रहोगे, बेचना भी चाहिए न!

शंका स्वाभाविक है। संदेह स्वाभाविक है। यह तथाकथित हमारा प्रेम बड़े संदेहों से भरा हुआ है।
मुल्ला नसरुद्दीन रात सपने में बड़बड़ा गया: कमला! कमला! और पत्नियां तो जागती ही रहती हैं। रात तो बिलकुल बैठी ही रहती हैं कि क्या बकता है रात, देख लें। उसी वक्त हिलाया, कहा, यह कमला कौन है?

मगर पति भी होशियार हैं, नींद में भी इतनी होशियारी रखते हैं। उसने कहा, कोई नहीं, घबड़ा न तू। यह एक घोड़ी का नाम है। रेसकोर्स की एक घोड़ी है। उस पर मैं दांव लगाने की सोच रहा हूं, वही मेरे दिमाग में चल रही है।
मगर पत्नी को इतनी आसानी से भरोसा तो नहीं आता। उसने कहा, ठीक है।
शाम को मुल्ला के दफ्तर उसने फोन किया कि वह रेसकोर्स की घोड़ी कमला ने फोन किया है, आपको पूछ रही है कि कहां हैं? क्या पता दे दूं?
कब तक छिपाओगे? कहां तक छिपाओगे? बेहतर है, कह दो। बेहतर है, साफ-साफ करो। और इतनी प्रीति तो दिखलाओ, इतना स्नेह तो जतलाओ, इतना भरोसा तो दिखलाओ। और स्मरण रखो कि दूसरे को भी इतनी ही स्वतंत्रता दो। स्वतंत्रता के फल मीठे हैं, सत्य के फल मीठे हैं। लेकिन अंत में। शुरू में कड़वे हैं। शुरू की कड़वाहट से मत डर जाना। और अंततः तुम्हारे ये सारे अनुभव तुम्हें ध्यान में ले आएंगे।
यहां मैंने अपने आश्रम में सारी तरह की चिकित्साओं की व्यवस्था की है। यहां कोई सौ चिकित्सा के समूह काम कर रहे हैं। सौ चिकित्सा पद्धतियां काम कर रही हैं। उनमें सब है चिकित्सा पद्धतियांे में, जिसका जो रोग हो, जिसका जहां मन अटका हो...। जैसे अगर किसी का मन कामवासना में अटका है, तो उसे मैं तंत्र की चिकित्सा पद्धतियाँ में भेजता हूं। तंत्र से गुजर कर ही फिर वह ध्यान कर पाता है। उसके पहले नहीं कर पाता। क्योंकि वह ध्यान करे क्या?
ध्यान करे कैसे?
यहां भारतीय मित्र आते हैं, वे मुझे लिखते हैं कि आप कहते हैं ध्यान करो, हम ध्यान करने बैठते हैं, पास में कोई सुंदर स्त्री ध्यान कर रही है, हमारा दिल वहीं-वहीं जाता है।
जाएगा ही। भारतीय शुद्ध संस्कृति का यह लक्षण है। और जाएगा कहां? सदियों से दबाया है, तो और जाएगा कहां? तुम्हारे पास में ही बैठा हुआ जो पाश्चात्य है, उसका कोई मन उस स्त्री में नहीं जा रहा है; क्योंकि स्त्री का काफी अनुभव हो चुका।
यह जान कर तुम चकित होओगे कि यहां जो मेरे संन्यासी हैं पश्चिम से आए हुए, उनका कोई रस स्त्री-पुरुष में नहीं है—वैसा रस जैसा कि भारतीयों का है, कतई नहीं है। सहज, सामान्य...। जैसे कोई चौबीस घंटे भोजन के संबंध में सोचे तो पागल है; और दिन में दो बार भोजन करे तो पागल नहीं है। किसी से तुम्हारा स्नेह नाता हो, प्रेम का संबंध हो, तो इसमें कोई विक्षिप्तता नहीं है। लेकिन कोई चौबीस घंटे बस यही-यही सोचता रहे, स्त्रियों की ही कतार लगी रहे, तो फिर रुग्णता है।
मगर तथाकथित संस्कृति और तथाकथित धर्म और तथाकथित महात्माओं ने तुम्हें जो दिया है, वह यही उनकी वसीयत है। इस वसीयत में तुम सड़ रहे हो। इस सड़ांध से तुम्हें मुक्त करना चाहता हूं, इसलिए मैं दुश्मन मालूम पड़ता हूं। मेरे पास लोग आते हैं, निजी तौर से स्वीकार करते हैं कि आप जो कहते हैं ठीक है, आप जो कहते हैं शत प्रतिशत ठीक है; लेकिन उनमें से एक भी सामूहिक वक्तव्य नहीं देता मेरे पक्ष में।
मेरे विपक्ष में लिखने वाले हजारों लोग हैं। मेरे पक्ष में लिखने वाले मुश्किल से कोई। मामला क्या है? और जो भी मेरे पक्ष में लिखते हैं, वे मेरे संन्यासी हैं। दूसरा कोई मेरे पक्ष में नहीं लिखता। दूसरे मुझे पत्र लिखते हैं कि आप जो कहते हैं, बिलकुल ठीक है; उचित कहते हैं; लेकिन हम इसको सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं कर सकते; क्योंकि हम इसको सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें, तो हमारी प्रतिमा धूमिल होती है।
यहां आने की हिम्मत नहीं पड़ती। यहां लोग आते हैं, छिप कर आते हैं। इनको तो मैं हिम्मतवर कहूंगा। वे प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। मैं उनके साहस का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने हिम्मतपूर्वक यह प्रश्न पूछा है। अब और थोड़ी हिम्मत जुटाओ, अपनी पत्नी को भी साफ करो। अपनी पत्नी को भी यहां ले आओ। अगर तुम साफ न कर सको तो मैं साफ करूंगा। दोनों मुक्ति में जीओ। और तुम पाओगे, तुम्हारा प्रेम इस मुक्ति में बढ़ेगा, फलेगा, गहरा होगा। और जल्दी ही तुम दोनों ही ध्यान की तरफ अपने आप आकर्षित हो जाओगे।
अगर व्यक्ति सहज-स्वाभाविक जीए, तो ध्यान अनिवार्य परिणति है, अपरिहार्य। जीवन की प्रत्येक नदी जैसे सागर की तरफ ले जाती है, ऐसे जीवन की प्रत्येक वासना ध्यान की तरफ ले जाती है, अगर हम वासना को कहीं रोक न दें। रोक दें तो तालाब बन जाती है। तालाब बना तो सागर से संबंध टूट गया। फिर सड़ना है। फिर कीचड़ है। फिर गंदगी है। फिर गति नहीं। फिर प्रवाह नहीं।
मैं चाहता हूं तुम सरिताओं की तरफ होओ, सरोवरों की तरफ नहीं; ताकि सागर को पाया जा सके। सागर को पाने में ही जीवन की धन्यता है, सौभाग्य है।
-ओशो
पिय को खोजन मैं चली
प्रवचन नं. 9 से संकलित
ओशो वर्ल्ड डाट काम से साभार

Keyword: prem, vichar, osho

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