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समष्टि अपनी इच्छाओं के परिपालन में ही सिकुड़कर व्यष्टि बन जाती है। इसी व्यष्टि को गीता, माया की संज्ञा देती है। मेरा यह लेख विशेष रूप से आध्यात्मिक साधकों के लिए एक विवेचना मात्र है। इस अनंत समष्टि में इच्छा रूपी तरंगों का उठना स्वाभाविक है। यह समष्टि के स्वभाव में है। लेकिन इच्छा रहित हो जाने का भी स्वभाव समष्टि में है। यही परम सत्ता है जो अनंत लहरों में भी शांत है। इच्छाओं का उठना ही मन का तरंगायित हो जाना है। और मन का तरंगायित हो जाना व्यष्टि है। मन का रुक जाना ही समष्टि है। चूंकि हमारी सारी रचना ही व्यष्टि है, प्रत्येक साधक में समष्टि कहां से शुरू होती है, यह उसके व्यष्टि की सीमा क्षेत्र पर निर्भर करता है। क्योंकि व्यष्टि का निर्माण मनुष्य स्वयं करता है। जो उसके संस्कारों के उपादान से निर्मित होता है। इसलिए उसका समाधि में जाना या निर्विकल्प होना उसकी आंतरिक व्यष्टि क्षेत्र पर निर्भर करता है। यह भी सत्य है कि समष्टि में प्रवेश के लिए व्यष्टि में साधक का होना परम आवश्यक है। क्योंकि व्यष्टि व समष्टि अलग सत्ता‍ नहीं है। व्यष्टि समष्टि का प्रक्षेपण या प्रोजेक्शन है। जिसे माया, लहर, मन, चित्त , भ्रम, मोह आदि विभिन्न नामों से संज्ञावर्धन किया गया है। जब भी चेतना तरंगायित होती है, वह व्यष्टि की सीमा में बंध जाती है। ऐसे ही कालखण्ड को विभाजित किया गया है। चार युगों का निर्माण मनुष्य की वृत्ति और मानसिक अवधारणाओं पर ही आधारित है। जिस कालखण्ड में चेतना अत्यधिक तरंगायित होने लगती है, उस कालखंड को कलयुग कहते हैं। ऐसी स्थिति में जगत का विकास और विस्तार ज्यादा होता है, जिसे भौतिक विकास या विस्तार कहते हैं। इन्हीं तरंगों का ही तो हम भी एक हिस्सा् हैं। लेकिन उस तरंग की एक शांत अवस्था भी निरंतर उसके गहन अस्तित्व में विराजमान है। हम निश्चित ही उस स्वभाव को प्राप्त कर सकते हैं। चेतना के तल पर भौतिक तरंगे तरंगायित होकर जगत के भौतिक विकास का अभिवर्धन करती है।स्वाभाविक रूप से उठने वाली ये अधोगामी तरंगें होती हैं। इसीलिए मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति भी ऐसी ही होती है। लेकिन उर्ध्वगामी तरंगों के अभाव में मनुष्य हमेशा एक कमी का एहसास करता है तथा इन्हीं अधोगामी में स्थायी आनंद की खोज करता है। लेकिन अभाव की स्थिति हमेशा बनी रहती है। उर्घ्वगामी तरंगों को जाग्रत करने के लिए, एक विशेष स्थिति में लाने के लिए साधक को क्रिया करनी पड़ती है जिसे क्रियायोग कह सकते हैं। इन्हीं़ उर्ध्वगामी तरंगों को सांकेतिक रूप से योग व तंत्र की भाषा में कुण्डलिनी नाम दिया गया है। कुण्डलिनी प्राण ऊर्जा का परम कुण्ड है। लाइफ फोर्स का एक सांकेतिक नाम है। जो मनुष्य के अस्‍ि‍तत्व में ही सिर्फ विराजमान है। यह एक इशारा है कि मनुष्य अस्तित्व का एक असाधारण हिस्सा है। जैसे सूक्ष्म तरंगों को पकड़ने के लिए मोबाइल, रेडियो, टीवी के स्थूल यंत्र ही काम करते हैं लेकिन ये स्थूल हिस्से सूक्ष्म तरंगों को पकड़कर मानव जीवन में विज्ञान के आश्चर्यजनक एवं असाधारण चमत्कारों को दिखाते हैं। ठीक उसी प्रकार हमारी तंत्रिकाएं, नाडि़यां जो देखने में स्थूल मांसपिण्ड व रस-मज्जा से बनी हैं, ये उस सूक्ष्म व परम ऊर्जा स्रोत को प्रकट करने में सक्षम हैं। इस प्रकार इस परम कुण्डो को प्राणों के प्रबल प्रवाह से ही छेड़ा जा सकता है। दुनिया की सारी साधना की विधाएं एक प्रकार से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से कुण्डलिनी शक्ति को ही छेड़ने की विधाएं हैं।
यह लेखक के अपने विचार हैं

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