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तुम जैसे भी हो, ठीक उससे उलटा होना ही मार्ग है। जिस दिशा में तुम चल रहे हो, उससे उलटा चल सकोगे तो पहुँचोगे।

गंगा बहती है सागर की तरफ। मूल स्रोत पीछे छूट गया है — गंगोत्री पीछे छूट गई है। आगे तो दूरी ही दूरी होगी। गंगोत्री तक पहुंचने का यह मार्ग नहीं है। गंगा को उलटा लौटना पड़े।

तुम्हारी चेतना की गंगा भी जब उलटी लौटेगी — गंगोत्री की तरफ लौटेगी, मूल स्रोत की तरफ, तभी तुम पहुँच पाओगे। क्योंकि, जिसे खोया है, उसे मूल स्रोत में ही खोया है। जिसे खोया है, वह आगे नहीं है; उसे तुम कहीं पीछे छोड़ आये हो।

इस बात को बहुत ठीक से विचार कर लेना। कबीर का यह सूत्र इसी तरफ इशारा है।

और कबीर कहते हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान है जिसे साधु को सोच लेना है। जिसे तुम खोज रहे हो उसे पीछे छोड़ आये हो। कभी वह तुम्हारी संपदा थी, विस्मृत हो गई। कभी तुम उसके मालिक थे और अब तुम भटक गये हो। अस्तित्व का समस्त आनंद कभी तुम्हारा था। निर्दोषता तुम्हारी थी। तुम साधु पैदा ही हुए थे। सभी साधु की तरह पैदा होते है। साधुता स्वभाव है। आसुधता अर्जित की जाती है। असाधुता तुम्हारी कमाई है, जो तुमने सीखी है। अपनी होशियारी से तुम असाधु हुए हो, निर्दोषता में तुम साधु थे ही।

सभी बच्चे साधु की तरह पैदा होते हैं — परम साधु की भांति। और संसार का जहर, शिक्षा-दीक्षा, संस्कार, भीड़, धीरे-धीरे उन्हें स्वभाव से हटा देती है। वे अपने केन्द्र से वंचित हैं। फिर जीवन भर उसी केंद्र की तलाश चलती है। लेकिन तलाश चलती है समाज के नियमों के अनुसार। और यही उपद्रव है।

समाज के नियमों ने ही तुम्हें केन्द्र से च्युत किया। उन्हीं नियमों को मान कर तुम खोज करते हो आनंद की। तुम और दूर होते चले जाते हो। तुम और भटक जाते हो। जिसने तुम्हें हटाया है स्वयं से, तुम उसकी ही मान कर चलते हो। समाज तुम्हारा गुरु हो गया है। और तुमने अपने अन्तःकरण की आवाज को सुनना बिलकुल बंद कर दिया है। और समाज ने एक झूठा अन्तःकरण तुम्हारे भीतर पैदा कर दिया है।

जब तुम चोरी करने जाते हो, तब तुम्हारे भीतर कोई कहता है, चोरी मत करो। जब तुम बुरा काम करने जाते हो, तुम्हारे भीतर कोई कहता है, बुरा मत करो। लेकिन यह तुम्हारे समाज के द्वारा दिया गया अन्तःकरण है। यह तुम्हारी अपनी आत्मा की आवाज नहीं है। यह समाज ही बोल रहा है।

समाज ने तुम्हें सिखा दिया है कि क्या बुरा है, क्या अच्छा है। और इसलिए अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग जातियों में, अलग-अलग अंतःकरण होगा। अगर तुम्हारा अंतःकरण ही बोलता हो — वही जो परमात्मा ने तुम्हें दिया हो, अछूता समाज से — तो उसकी आवाज तो सारी दुनिया में सभी युगों में एक ही होगी। वह तो शाश्वत होगा। अभी तो अगर तुम हत्या करने जाओ तो तुम्हारा अतःकरण — जो कि वस्तुतः तुम्हारा नहीं है, समाज का धोखा है; तुम्हारे वास्तविक अंतःकरण के ऊपर एक और अंतःकरण थोप दिया गया है समाज की शिक्षा का — वह कहता है, हत्या मत करो। फिर कल तुम मजिस्ट्रेट हो और वही अंतःकरण अब नहीं कहता कि हत्या की सजा मत दो। अब तुम मजे से सैकड़ों को लटका देते हो सूली पर।

या कल तुम युद्ध के मैदान पर चले जाते हो। समाज का अतःकरण कल तक कहता था कि हत्या पाप है। चीटीं भी मारते तो भीतर अपराध अनुभव होता था। युद्ध के मैदान में तुम दिल खोल के लोगों को काटते हो। और वही समाज का अंतःकरण तुमसे कहता है, तुम महान कार्य कर रह हो। तुम्हारी चिता पर मेले लगेंगे। तुम बड़े वीर हो। देश तुम्हारा सदा-सदा इतिहास स्मरण रखेगा, गुणगान करेगा।

अगर तुम्हारा ही अंतःकरण बोलता हो तो चाहे तुम हत्या करने जाओ, चाहे मजिस्ट्रेट की तरह किसी को फांसी की सजा दो, चाहे युद्ध के मैदान पर किसी की छाती पर बंदूक तानो — उस अंतःकरण की आवाज एक ही होगी, कि नहीं, गलत कर रहे हो; मिटाना गलत है; नष्ट करना गलत है। क्योंकि परमात्मा स्रष्टा है। और तुम विध्वंस कर रहे हो? — तो तुम परमात्मा से दूर जा रहे हो।

तुम्हारा वास्तविक अंतःकरण हर परिस्थिति में बेशर्त कहेगा, हिंसा बुरी है। लेकिन समाज के द्वारा जो अंतःकरण दिया है वह कभी तो कहेगा, हिंसा बुरी है, जब समाज के हित में होगा; कभी कहेगा, हिंसा ठीक है, जब समाज के हित में होगा; कभी कहेगा बेपरवाह हिंसा करो — यही पुण्य है, यही धर्म है — जब समाज की सुविधा होगी। ऐसा लगता है, हत्या का सवाल नहीं है; समाज की सुविधा-असुविधा का सवाल है।

अगर तुम इस अंतःकरण से भरे रहे तो तुम अपने अंतःकरण को कभी भी न खोज पाओगे। और तुम इसी के सहारे उसे खोजने की कोशिश कर रहे हो। नीति के मार्ग से तुम धर्म तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हो और नीति ही वह व्यवस्था है जिसने तुम्हें धर्म से वंचित किया है।

कबीर के इन वचनों को समझना बड़ा क्रांतिकारी होगा। तुम भरोसा ही न करोगे कि ऐसी बात संत कह सकेंगे। लेकिन संत ही ऐसी बात कह सकते हैं। क्योंकि वे ही परम विद्रोही हैं, और वे तो वही कहते हैं जो ठीक है। क्या होगा परिणाम, समाज भला-बुरा कैसा सोचेगा, इसकी उन्हें चिंता नहीं।
-ओशो
कहै कबीर मैं पूरा पाया
प्रवचन नं. 7 से संकलित
ओशो वर्ल्‍ड डाट काम से साभार

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