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लेखक- श्रीमती रीता अग्रवाल
मानव एक चिंतनशील प्राणी है। वह अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य के संबंध में निरंतर चिंतनशील रहता है। अतीत से गुजरते हुए वह अपने वर्तमान की सुखद, दु:खद स्मृतियों में डूबता-उभरता हुआ भविष्य के बारे में सोचने लगता है कि विवाह के बाद उसका भविष्य क्या होगा? पति व पत्नी के आपसी संबंध कैसे रहेंगे? इसी आशंका से सशंकित होकर वह किसी अच्छे ज्योतिषी द्वारा कुण्डली मिलान करवाता है जो ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसका निवारण बताता है।
दामपत्य जीवन को सफल बनाने में वृहस्पति ग्रह की विशेष भूमिका है। स्त्री की कुण्डली में वृहस्पति को पति के रूप में माना गया है। सप्तम भाव यानी विवाह भाव का कारक भी वृहस्पति को माना गया है। भले ही सप्तम भाव का स्वामी ग्रह अच्छी स्थिति में न हो या सप्तम भाव में पापग्रह स्थित हों या सप्तम भाव पर पाप ग्रह का प्रभाव हो, लेकिन यदि सूक्ष्म गणित से वृहस्पति बलवान होकर केन्द्र के त्रिकोण में स्थित हो या उसपर शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो तो स्त्री को उत्तम पति सुख मिलेगा। उसका वैवाहिक जीवन सुखद एवं मंगलमय होगा। समस्त दोषों को दूर कर बलवान व शुभ वृहस्पति विवाहित जीवन को मंगलमय बना देता है। जब वृहस्पति शुभ स्थिति में न हो, निर्बल हो, लग्न से छठें, आठवें, बारहवें भाव में स्थित हो, पाप ग्रह के साथ हो या उसपर पाप ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो या अपने नीच राशि मकर में स्थित हो अथवा 29 या 30 अंशों में स्थित हो तो ज्योतिष में ऐसा वृहस्पति अशुभ फल देने वाला माना जाता है। ऐसी स्त्री का या तो विवाह नहीं होता है या अत्यधिक बाधाओं के साथ काफी विलम्ब से होता है। विवाह तय होने में व्यवधान आता है, सगाई की बात लम्बे समय तक चलती है या सगाई होकर टूट जाती है या बड़ी आयु में विवाह हो पाता है।
वृहस्पति यदि अस्त हो या वक्री हो, ऐसी स्थिति यदि कन्या का विवाह सही आयु में हो भी जाता है तो भी उस कन्या को वैवाहिक जीवन का सुख नहीं मिलता है। वैवाहिक जीवन दु:खद अन्यथा तलाक की स्थिति बन जाती है। इन्हीं सभी समस्याओं के समाधान हेतु हमें ज्योतिष शास्त्र द्वारा उचित मार्गदर्शन मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में बताए उपायों द्वारा हम अपने जीवन में आने वाले कष्टों का निवारण कर सकते हैं।
वृहस्पति को प्रसन्न रखने के उपाय
1- वृहस्पति का प्रिय रत्न पीला पुखराज 5 से 6 रत्ती का स्वर्ण की अंगूठी में जड़वाकर तथा अंगूठी की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर वृहस्पतिवार को शुभ मुहुर्त में दाएं हाथ की तर्जनी में धारण कर सकते हैं।
2-वृहस्पतिवार को पीली वस्तुओं का दान करें।
3- वृहस्पतिवार को केले के पत्तों का पूजन करें और पीला वस्त्र पहनें।
4- विवाह हेतु गौरी-शंकर की पूजा करें और सोमवार का व्रत रहें।
5- मार्गशीर्ष के महीने में मां कात्यायनी का 21 दिन तक पूजन करें।
इन्हीं लघु उपायों से हम अपना वैवाहिक जीवन सफल, सुखद एवं मंगलमय बना सकते हैंऔर साथ ही अपने बच्चों में अच्चे संस्कार और धर्म के बीज रोपित कर सकते हैं। उपाय के तौर पर व्यक्ति कभी भी अभिमान न करे, प्रत्येक व्यक्ति सूर्यदेव को नियमित जल चढ़ाए और उसके जीवन में जो कुछ घटित हो रहा है, उसके लिए परमपिता परमात्मा को धन्यवाद देकर अपना कर्म करते हुए सदा प्रसन्न रहे।
यह लेखक के अपने विचार हैं।

keyword: jyotish

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  1. शादी हुई नहीं
    पति पत्नी
    गृह खुद हो जाते हैं
    वैवाहिक जीवन
    कैसा होगा ये
    तो उनके
    आपस में चक्कर
    लगाने के तरीके
    भी बताते है
    ऊपर से बाकी के
    नौ गृह मिलकर
    दोनो को घुमाते हैं
    जो समझते हैं
    फूल पत्ती
    अगरबत्ती चढा़ते हैं !

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    1. आप बिल्‍कुल मेरी तरह सोचते हैं, आपके सोचने का ढंग काव्‍यात्‍मक है, बस यही अंतर है।

      धन्‍यवाद

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  2. पहले तो आप अपनी काल गणना शुद्ध कर लो .ग्रह नौ नहीं अब आठ हैं .प्लूटो (यम )से ग्रह का दर्जा छीना जा चुका है यह आकार में चन्द्रमा से भी छोटा होने की वजह से अब लघु ग्रह बोले तो प्लेनेटोइड कहलाता है .

    वैसे ज्योतिष- गीरी का विषाणु चैनलिया बड़े जोर शोर से फैला रहें हैं ,अब यह ब्लॉगजगत को भी संक्रमित करने लगा .

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    1. संक्रमण जीवन में घुल गया है। जीवन जहां-जहां है। वहां- संक्रमण जाएगा ही।
      धन्‍यवाद

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