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रमता है सो कौन घट-घट में विराजत है,
रमता है सो कौन बता दे कोई।
अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उपरोक्त अनूठी रहस्यमय अमरवाणी के उद्घोष के साथ ही अघोरेश्वर भगवान राम ने अपना सूक्ष्म अलौकिक परिचय देते हुए स्वयं कहा था- ‘मैं अघोरेश्वर स्वरूप ही स्वतंत्र, सर्वत्र, सर्वकाल में स्वच्छंद रमण करता हूं। मैं अघोरेश्वर ही सूर्य की किरणों, चंद्रमा की रश्मियों, वायु के कणों और जल की हर बूंदों में व्याप्त हूं। मैं अघोरेश्वर ही पृथ्वी के प्राणियों, वृक्षों, लताओं, पुष्पों और वनस्पतियों में विद्यमान हूं। मैं अघोरेश्वर ही पृथ्वी और आकाश के बीच जो खाली है उसके कण-कण में, तृष्रेणुओं में व्याप्त हूं। साकार भी हूं, निराकार भी हूं। प्रकाश में भी हूं और अंधकार में भी मैं ही हूं। सुख में हूं और दु:ख में भी मैं हूं। आशा में हूं और निराशा में भी मैं ही हूं। भूत में, वर्तमान में और भविष्य में एक साथ विचरण करने वाला मैं ही हूं। मैं ज्ञात भी हूं और अज्ञात भी । स्वतंत्र भी हूं और परतंत्र भी । आप जिस रूप में मुझे अपनी श्रद्धा सहेली को साथ लेकर ढूढेंगे मैं उसी रूप में आपको मिलूंगा।’
अवधूत भगवान राम के निर्वाण दिवस पर विशेष

सही अर्थों में अघोरेश्वर का परिचय वही दे सकता है जिसने मन तथा बुद्धि की पकड़ से परे उन अघोरेश्वर को जाना हो। लेकिन उनका भौतिक शरीर 12 सितम्बर 1937 को बिहार के भोजपुर जनपद के कुण्डी ग्राम में अवतरित हुआ। पिता बैजनाथ सिंह की एकमात्र संतान होने के कारण पिता ने भावावेश में कहा दिया कि मेरे घर भगवान का जन्म हुआ है। उन्होंने उनका नाम भगवान रख दिया। उन्हें क्या पता था कि यह बालक आगे चलकर सचमुच औघड़ भगवान राम के नाम से विख्यात होगा। पांच वर्ष की अवस्था में ही पिता का शिवलोक गमन हो गया। सात वर्ष की अवस्था में उन्होंने घर-बार छोड़ दिया। इसके बाद वह क्रीं कुण्ड (कीनाराम आश्रम) वाराणसी पहुंचे तो वहां के महंथ बाबा राजेश्वर रामजी से अघोर मंत्र दीक्षा लेकर अवधूत भगवान राम बन गए। इसके बाद बाबा भ्रमण पर निकल गए। वह मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर तथा पूजा आदि की प्रचलित अवधारणा से बिल्कुल भिन्न विचार रखते थे। उनका कहना था कि पत्थरों, र्इंटों से निर्मित देवालयों में यदि विश्वास चिपका तो सर्वनाश है। आजीवन वे मानवता की सेवा और कल्याण करते रहे। 29 नवम्बर 1992 को उन्होंने अमेरिका के कैलिफोर्निया में पद्मासन में शरीर छोड़ा। यहां भक्तों के दर्शन के लिए उनका शरीर उसी अवस्था में वाराणसी लाया गया था। इस दिन उनका परिनिर्वाण दिवस धूमधाम से मनाया जाता है।

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