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ब्रह्मवैवर्त पुराण में षष्ठी देवी के महात्म्य, पूजन विधि एवं पृथ्वी पर इनके पूजा प्रसाद इत्यादि के विषय में चर्चा की गई है किन्तु सूर्य के साथ षष्ठी देवी के पूजन का विधान तथा ‘सूर्यषष्ठी’ नाम के व्रत की चर्चा नहीं की गई है। इस विषय में भविष्य पुराण में प्रतिमास के तिथि व्रतों के साथ षष्ठीव्रत का उल्लेख स्कन्द षष्ठी के नाम से किया गया है। परन्तु इस व्रत के विधान और सूर्यषष्ठी व्रत के विधान में पर्याप्त अंतर है। मैथिल ग्रन्थ ‘वर्षकृत्यविधि’ में ‘प्रतिहार षष्ठी’ के नाम से बिहार में प्रसिद्ध सूर्यषष्ठी की चर्चा की गयी है। इस ग्रन्थ में व्रत पूजा की पूरी विधि कथा तथा फलश्रुति के साथ तिथियों के क्षय एवं वृद्धि की दशा में कौन सी तिथि ग्राह्य है, इस विषय पर भी धर्मशास्त्रीय दृष्टि से सांगोपांग चर्चा हुई है और अनेक प्रामाणिक स्मृति ग्रन्थों से पुष्कल प्रमाण भी दिये गये हैं। आजकल इस व्रत के अवसर पर लोक में जिन परम्परागत नियमों का अनुपालन किया जाता है, उनमें इसी ग्रन्थ का सर्वथा अनुसरण दृष्टिगत होता है। कथा के अंत में ‘इति श्री स्कन्द पुराणोक्त प्रतिहार षष्ठी व्रत कथा समाप्ता’ लिखा है। इससे ज्ञात होता है कि ‘स्कन्द पुराण’ के किसी संस्करण में इस व्रत का उल्लेख अवश्य हुआ होगा। अत: इस व्रत की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता भी परिलक्षित होती है। प्रतिहार का अर्थ है- जादू या चमत्कार अर्थात चमत्कारिक रूप से अभीष्ट को प्रदान करने वाला व्रत। इस ग्रन्थ में षष्ठी व्रत की कथा अन्य पौराणिक कथाओं की तरह वर्णित है। यहां भी नैमिषारण्य में शौनकादि मुनियों के पूछने पर श्रीसूत लोककल्यार्थ सूर्यषष्ठी व्रत के महात्म्य विधि तथा कथा का उपदेश करते हैं।
इस कथा के अनुसार एक राजा है, जो कुष्ठरोग से ग्रसित एवं राज्यविहीन है। वह किसी विद्वान ब्राह्मण के आदेशानुसार इस व्रत को करता है, जिसके फलस्वरूप वह रोगमुक्त होकर पुन: राज्यारूढ़ एवं समृद्ध हो जाता है। पंचमीयुक्त षष्ठी का निषेध किया गया है। जैसा कि स्कन्दपुराण में कहा गया है- ‘नाग विद्धा न कर्तव्या षष्ठी चैव कराचन।’ इसके प्रमाणस्वरूप राजा सगर की कथा का उल्लेख किया गया है। राजा सगर ने एक बार पंचमीयुक्त षष्ठी व्रत को किया था जिसके फलस्वरूप कपिलमुनि के शाप से उनके साठ हजार पुत्रों का विनाश हो गया। इस दृष्टान्त से इस व्रत की प्राचीनता द्योतित होती है। व्रत की विधि में बताया गया है कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में सात्विक रूप से रहना चाहिये। पंचमी को एक बार भोजन करें। वाक्संयम रखें, षष्ठी को निराहार रहें तथा फल, पुष्प, घृतपक्व नैवेद्य, धूप, दीप इत्यादि से नदी तट पर जायें और गति वाद्य आदि से हर्षोल्लास पूर्वक महोत्सव मनायें। भगवान सूर्य का पूजन कर भक्तिपूर्वक उन्हें रक्तचंदन तथा रक्तपुष्प अक्षत युक्त अर्घ्य निवेदित करें।
‘‘कार्तिक शुक्लपक्षे तु निरामिष परो भवेत।
पंचम्यामेक भोजी स्याद् वाक्यं दुष्टं परित्यजेत।।
षष्ठयां चैव निराहार: फलपुष्प समन्वित:।
सरित्तरं समासाद्य गन्ध दीप मनोहरै:।।
धूपैर्नानाविधैर्दिव्यै: नैवेद्यैर्घृत पाचितै:।
गीत वाद्यादि भिश्चैव महोत्सव समन्वितै:।।
समभ्‍यर्च्य रविं भक्तया दद्यादर्घ्य विवस्वते।
रक्चंदन सम्मिश्रं रक्त पुष्पाक्षतान्वितम्।।’’
यह मैथिलग्रन्थ ‘वर्षकृत्यविधि’ में कहा गया है। इस ग्रन्थ में अर्घ्य प्रदक्षिणा एवं नमस्कार मंत्र उल्लिखित हैं। सविता और षष्ठी दोनों की एक साथ उपासना से वांछित फलों को प्रदान करने वाला यह सूर्यषष्ठी व्रत बहुत महत्वपूर्ण है।

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