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भैया दूज के तीसरे दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक धूमधाम व आस्था-श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मूलत: बिहार से शुरू हुए इस पर्व की धूम अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, नेपाल, दिल्ली व मुम्बई तक पहुंच गई है। यह पर्व सूर्योपासना पर आधारित है और मूलत: तेजस्वी पुत्र प्राप्ति की कामना के साथ स्त्रियां इसे मनाती हैं। यह ऐसा पर्व है जिसमें महिलाएं व्रत रहती हैं लेकिन पूरा परिवार इस व्रत में शामिल होता है।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार भगवान राम ने अपने राज्याभिषेक के उपरान्त माता सीता सहित इस व्रत को सर्वप्रथम किया था। महाभारत काल में यह व्रत द्रोपदी ने वनवास के दौरान राजपाट की पुन: प्राप्ति की कामना के लिए किया था। आज यह पर्व न केवल पुत्र की कामना के लिए किया जाता है वरन सर्वविध सुख, आरोग्य एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इसे षष्ठी देवी के निमित्त भी मनाया जाता है। लोक परंपरा के अनुसार षष्ठी देवी भगवान सूर्य की बहन थीं। सर्वप्रथम इनकी पूजा सूर्यदेव ने ही की थी। पुराणों में उल्लेख है कि राजा प्रियंवद (प्रियव्रत) की कोई संतान नहीं थी, महर्षि कश्यप ने उनके लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। उसके प्रभाव से राजा प्रियंवद को एक पुत्र उत्पन्न हुआ परन्तु वह मृतावस्था में पैदा हुआ। प्रियव्रत पुत्र के वियोग में अत्यंत व्याकुल होकर प्राण त्यागने को उद्धत हुए, उसी समय षष्ठी देवी प्रगट हुर्इं। उन्होंने कहा कि सृष्टि के मूल प्रकृति के छठें अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं, राजन तुम मेरा पूजन करो। तब राजा ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पुत्रेच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उनकी पूजा की। उसके प्रभाव से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। ऐसा माना जाता है कि तभी से यह पूजा प्रचलित हुई।

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