0
सूर्यषष्ठी व्रत (छठ पर्व) अनेक पौराणिक व लोकगाथाओं से गुंथा हुआ है। सभी कथाएं इसके महत्व पर प्रकाश डालती हैं।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार छठ पर्व की एक लोकगाथा द्रोपदी से जुड़ी हुई है। पाण्डव राज्यविहीन होकर जंगल में भटक रहे थे, उस समय द्रोपदी उनके साथ थी। पाण्डवों की स्थिति से दु:खी द्रोपदी ने जुए में खोए राज्य की प्राप्ति व सुख-समृद्धि एवं शांति की कामना को लेकर कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य की उपासना एवं आराधना की थी। द्रोपदी की अपार श्रद्धा-भक्ति से प्रभावित होकर सूर्य ने उसे मनोवांछित फल प्रदान किया जिससे पाण्डवों ने अपना खोया हुआ राज्य पुन: प्राप्त किया।
दूसरी कथा के अनुसार शर्याति नामक राजा थे। उनकी एक कन्या थी जिसका नाम था सुकन्या। एक बार राजा शर्याति जंगल में शिकार खेलने गए। उनके साथ उनकी सेना और उनकी कन्या सुकन्या अपनी सखियों सहित गई। खेलते हुए सुकन्या च्यवन ऋषि की आंखों को अज्ञानतावश भेदन कर दी। ऋषि की दोनों आंखें फूट गईं। ऋषि के शाप से सबका उदर फूल गया। सैनिक सहित सभी दर्द से छटपटाने लगे। राजा शर्याति ने सभी से पूछा कि किसी ने यहां अपराध तो नहीं किया। राजा की पुत्री ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। राजा ऋषि का आशय जानकर अपनी कन्या का विवाह अंधे च्यवन ऋषि के साथ कर दिए और संकट से मुक्त हो गए। एक दिन कार्तिक मास में नाग कन्याओं को सूर्यषष्ठी का व्रत करते देखकर सुकन्या ने भी पूर्ण श्रद्धा के साथ इस व्रत को किया जिसके प्रभाव से च्यवन ऋषि की आंखों की ज्योति वापस आ गई।।
तृतीय कथा के अनुसार मगध सम्राट जरासंध के किसी पूर्वज को कुष्ठ रोग हो गया। उन्हें कुष्ठ रोग से मुक्त करने के लिए शाकलद्विपीय ब्राह्मण मगध में उपस्थित हुए और सूर्योपासना के द्वारा उनके कुष्ठ रोग को दूर करने में सफल हुए। कहा जाता है कि मगध क्षेत्र में सर्वप्रथम सूर्य की पूजा शुरू हुई। मग ब्राह्मणों से आवृत होने के कारण यह क्षेत्र मगध कहलाया और मग लोग सूर्योपासक थे। सूर्य की रश्मियों से चिकित्सा करने में इन्हें भारी सफलता मिली थी। इसलिए पूरी निष्ठा व नियम पूर्वक चतुर्थ दिवसीय सूर्योपासना के रूप में छठ पर्व की परंपरा प्रचलित हुई और उत्तरोत्तर समृद्ध होती चली गई।
एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कंद को छह कृतिकाओं ने अपना स्तनपान कराकर उसकी रक्षा की थी। उस समय स्कंद के छह मुख हो गए थे। कृतिकाओं द्वारा उन्हें दुग्धपान कराया गया था इसलिए ये कार्तिकेय कहलाए। लोकमान्यता यह भी है कि यह घटना जिस मास में घटी थी उस मास का नाम कार्तिक पड़ गया। अतएव छठ मइया की पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को किया जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार इस पर्व को राजा प्रियव्रत से जोड़ा गया है। राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया और पत्नी को चरू प्रदान किया। पुत्र तो हुआ लेकिन मृतावस्था में। पुत्र वियोग में राजा ने प्राण त्यागने का यत्न किया। उसी समय मणियुक्त विमान पर एक देवी वहां आ पहुंची। राजा ने देवी को प्रणाम किया और उनका परिचय पूछा। देवी ने कहा कि वह ब्रह्मा की मानस कन्या देवसेना हैं। मूल प्रकृति के छठें अंश से उत्पन्न होने के कारण वह षष्ठी कहलाती हैं। वह पुत्रहीन को पुत्र, निर्धन को धन, रोगी को आरोग्य और कर्मवान को उसके श्रेष्ठ कर्मों का फल प्रदान करती हैं। राजा प्रियव्रत ने उस देवी का पूजन किया और उनका मृत पुत्र जीवित हो गया। यह पूजा कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को की गई थी। तभी से यह व्रत प्रचलन में आया।
देवी भागवत के अनुसार मूल प्रकृति के छठें अंश से प्रगट होने के कारण इस देवी का नाम षष्ठी पड़ा। जो व्यक्ति षष्ठी देवी के बीज मंत्र ‘ह्रीं षष्ठी देव्यै नम:’ का निष्ठा पूर्वक जप करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

keyword: chhath vrat

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top