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कार्तिक शुक्ल एकादशी 24 नवम्बर को है। इसे देवोत्थान या प्रबोधनी एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि अषाढ़ शुक्ल एकादशी (हरिशयनी) एकादशी को भगवान क्षीर सागर में शयन (योगनिद्रा) करने के लिए चले जाते हैं और चार माह बाद देवोत्थान एकादशी के दिन जागते हैं। इन चार महीनों में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होते। देवोत्थान एकादशी के बाद विवाहादि मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है।
ज्योतिषी पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार देवोत्थान एकादशी के दिन निर्जल व्रत रह भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना करनी चाहिए और रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन करना चाहिए। समस्त तीर्थों के सेवन से जो पुण्य मिलता है, उससे कोटि गुना फल इस एकादशी के दिन अर्घ्य दान से प्राप्त होता है। जो इस दिन अगस्त्य के पुष्प से हरि का पूजन करता है उसे देव गण नमन करते हैं। जो बेल पत्रों से श्रीकृष्ण का पूजन करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। तुलसी दलों व मंजरियों से विष्णु का पूजन करने पर करोड़ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो कदम्ब के फूलों से जनार्दन का पूजन करते हैं उन्हें नरक की यातना से मुक्ति मिलती है। यह एकादशी त्रिविध पापों को नष्ट करती है।
एक सौ सैंतालिस दिन शयन के बाद नारायण 24 नवम्बर को जाग्रत होंगे। पिछले 30 जून शनिवार को भगवान विष्णु शयन के लिए क्षीर सागर में चले गए थे। पद्मपुराण के अनुसार शंखासुर नामक दैत्य देवताओं से अवध्य था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान नारायण ने बड़ी कुशलता व चातुर्य बुद्धि से उस दैत्य का वध किया। कई हजार वर्ष तक उसके साथ वह युद्ध करते रहे। उसका वध करने के बाद वह काफी थक गए थे। इसलिए क्षीर सागर में जाकर सो गए। पुन: चार माह पश्चात एकादशी के दिन जगे। इन चार महीनों में मांगलिक कार्य निषिद्ध रहते हैं।
24 नवम्बर को सूर्योदय 6.41 बजे और एकादशी तिथि का मान 15 दंड 10 पला अर्थात दिन में 12.45 बजे तक है। कला मात्र भी सूर्योदय के पश्चात एकादशी रहे तो वह मान्य है। इसलिए 24 नवम्बर देवोत्थान एकादशी के लिए मान्य रहेगा।
क्या करें इस दिन
प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर पूरे दिन अखंड व्रत रखें। रात्रि के समय भगवत्कथा व विष्णु स्त्रोत्र के पाठ के अनंतर शंख, घंटा, घड़ियाल इत्यादि का वादन करते हुए निम्न श्लोक का उच्चारण कर भगवान को जगाएं-
उत्तिष्ठोतिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रा जगत्पते।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगद्सुप्तमिदं भवेत।।
उत्तिष्ठोतिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृत वसुन्धर।
हिरण्याक्ष प्राण घातिन त्रैलोक्ये मंगलं कुरु।।
भगवान को जगाने के पश्चात भगवान की षोडसोपचार पूजा करनी चाहिए। आरती करें और विविध प्रकार के नैवेद्य अर्पित करें। एकादशी की रात जागरण कर पूजा-प्रार्थना के बाद द्वादशी में पारण करना चाहिए।
एकादशी वैष्णवों का पवित्र व्रत है। इस दिन खड़िया और गेरू से आंगन में देवों की आकृति बनाकर वहां घी का दीपक जलाकर सिंघाड़ा, बेर, ऋतुफल, गन्ना व संतरा इत्यादि रखा जाता है। रात्रिकाल में परिवार के सभी व्यक्ति देवताओं का पूजन थाली बजाते हुए ‘उठो देवा, बैठो देवा’ इत्यादि कहकर देवों को जगाते हैं। सायंकाल तुलसी की भी पूजा करनी चाहिए।
स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में कहा गया है कि कार्तिक की शुक्ला एकादशी अत्यंत पवित्र तिथि है जो इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करता है और रात्रि जागरण करता है, भगवान के प्रसाद का भक्षण करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है। इस दिन कुछ भक्त तुलसी विवाह का भी आयोजन करते हैं।
पारण
स्कंद पुराण के अनुसार यदि द्वादशी के दिन रेवती का चौथा चरण व्यतीत हो रहा हो तो उस समय पारण नहीं करना चाहिए। 25 नवम्बर को प्रात:काल रेवती नक्षत्र प्रात: 7.53 बजे तक है। इसलिए पारण इसके बाद ही किया जाएगा।

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  1. देवोत्थान एकादशी का बहुत ही सुन्दर सार्थक विवरण आपने प्रस्तुत किया है हम अवश्य इससे लाभान्वित होंगे..आभार

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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