0
दीपावली पर रात्रि में ही लक्ष्मी पूजन का महत्व है। वैसे दिन में भी अमावस्या होने पर शुभ-लाभ, अमृत एव माहेन्द्र वेला में पूजन किया जा सकता है। वृषभ और सिंह लग्न उत्तम माने गए हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार अर्धरात्रि में लक्ष्मी पूजन श्रेष्ठ माना गया है। प्रदोष काल में दीपों की कतार से घर सजाने का विधान किया गया है और अर्धरात्रि तक उनके स्वागत-पूजन की तैयारी कही गई है।
श्रीलक्ष्मी करोड़ों सूर्य के समान जाज्वल्यमान हैं। इसलिए इनका एक नाम ज्वलंती भी है। ये दु:ख-दारिद्रय को जलाकर सुख का प्रकाश बांटती हैं। दीपक पूजन के समय कहा जाता है- दारिद्रय नाशयं दीपं दीप ज्योति नमोऽस्तुते। इस दिन दो तत्वों का संयोग होने से भूलक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और गायत्री नामक अग्नि बाहर निकलकर ऊपर चली जाती है। महाभारत शांति पर्व के अनुसार लक्ष्मी शुभ कार्यों से उत्पन्न होती हैं और चतुरता से वृद्धि को प्राप्त होती हैं। संयम से स्थिर रहती हैं। लक्ष्मी धन-धान्य की देवी हैं और सरस्वती विद्या-बुद्धि की अधिष्ठात्री। सरस्वती को भी श्री कहा गया है। लक्ष्मी व सरस्वती पृथक-पृथक नहीं हैं। विद्या-बुद्ध से युक्त लक्ष्मी को श्रीलक्ष्मी कहा जाता है। इसलिए दीपावली के दिन लक्ष्मी के साथ सरस्वती की भी पूजा की जाती है। लक्ष्मी का एक वाहन उल्लू भी है। उल्लू मूर्खता व पदार्थवादी बुद्धि का परिचायक है। जब जिस घर में लक्ष्मी उल्लू पर आरूढ़ हो जाती हैं तो व्यक्ति पदार्थवादी होकर मूर्खतापूर्ण आचरण करने लगता है। लक्ष्मीजी के दो वाहन और कमल व हाथी भी हैं। कमल निर्मल ज्ञान व वैभव और हाथी भोग-विलास व राजसी मार्ग को दर्शाता है। आत्मकेन्द्रित न होकर समस्त मानव कल्याण के लिए कमलासना लक्ष्मी की उपासनी करनी चाहिए।

keyword: dipawali

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top