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ऐसा कोई दीया नहीं है जिसमें तेल और बाती न हो। सभी दीया तेल और बाती से भरपूर हैं। बस जलना भूल गए हैं और अपने भीतर प्रकाश की पूरी संभावना लेकर भी अंधेरे में भटक रहे हैं। जानने वालों ने कहा है कि हर दीया में पूरा तेल और बाती है। बस उन्हें जलने के लिए तैयार होने की जरूरत है। उनके भीतर प्रकाश की असीम संभावनाएं हैं। लेकिन जब किसी बुद्ध पुरुष ने किसी दीया को अंधेरे बाहर निकालने की कोशिश की तो वह दीया उसके खिलाफ हो गया। बरसों से अंधेरे में भटकते रहने की आदत के चलते उसे प्रकाश पथ रास नहीं आया।
मनुष्य एक ऐसा दीया है जिसमें भरपूर तेल व बाती है। लेकिन ज्यादातर लोग बिना जले ही मर जाते हैं। उनको पता ही नहीं होता कि उनके भीतर असीम प्रकाश की संभावनाएं हैं। इसे सात शरीरों के माध्यम से समझना थोड़ा और आसान होगा। मनुष्य के भीतर सात शरीर या चक्र होते हैं। जिनमें पहला मूलाधार जो काम केन्द्र पर होता है। दूसरा सहस्रार जो सिर में होता है। ओशो कहते हैं कि सभी लोग प्रथम तल पर पैदा होते हैं और ज्यादातर लोग पहले तल पर ही मर जाते हैं। जो लोग पहले तल पर पैदा होकर सातवें तल की यात्रा कर लेते हैं उनके भीतर का दीया जल उठता है और वे असीम प्रकाश से भर जाते हैं। ऐसे लोगों ने ही मनुष्य होने का पूरा-पूरा उपयोग किया है। जब वह दीया स्वयं प्रकाश से भर जाता है तो आसपास के दीयों के भीतर भी प्रकाश की संभावनाएं नजर आने लगती हैं और वे जलने के लिए प्रयासरत हो उठते हैं। जिसके भीतर दीया जल गया उसे ही हम बुद्ध, जिन और परमात्मा कहते हैं। फिर वह अद्वैत को उपलब्ध हो गया। उसका द्वंद्व अर्थात संसार पीछे छूट गया अथवा वह संसार से ऊपर उठ गया। अब वह संसार में रहेगा भी लेकिन अंधकार उसे छू भी नहीं पाएगा। वह स्वयं प्रकाशित हो गया तो संसार को प्रकाशित करने की कोशिश करेगा। उसकी कोशिश कितनी सफल होती है कितनी असफल वह इसकी भी चिंता नहीं करेगा। अब वह हर भांति व भाव से निश्चिंत हो गया है। वह अपनी निजता को उपलब्ध हो गया है। वह अपने स्वभाव में आ गया है। उसे पता चल गया है कि अंधकार है ही नहीं, सिर्फ प्रकाश है और जब तक संसार में रहेगा प्रकाश की बात करता रहेगा। आपके भीतर का दीया भी इस दीपावली पर जल उठे, ताकि आप शाश्वत प्रकाश से नहा उठें, उसका प्रकाश शश्वत है। दीपावली पर मेरी तरफ से आप सभी को शुभकामनाएं।

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