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दीपावली पांच दिनों का पर्व है। यह धनतेरस से या भैयादूज तक चलता है। यह पर्व सुख-समृद्धि, पारिवारिक व सामाजिक संबंधों को मजबूत करने वाला है। दीपावली के दिन ही भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त कर लौटे थे। यह पर्व उनके अयोध्या लौटने की खुशी में पहली बार मनाया गया था। पं. शरदचंद्र मिश्र ने पांचों पर्वोँ पर अपने विचार साझा किए।
धनतेरस: 11 नवम्बर दिन रविवार को सूर्योदय 6.35 बजे और द्वादशी तिथि का मान 9 दंड 20 पला अर्थात दिन में 10.18 बजे तक है। इसके बाद त्रयोदशी लग रही है। इस दिन धनतेरस (धन त्रयोदशी) और धनंवतरि जयंती का आयोजन होगा। समुद्र मंथन के समय हाथों में अमृत का कलश लिए धनवंतिर की उत्पत्ति इसी दिन हुई थी। यह पर्व आम जनता के साथ वैद्यों एवं चिकित्सकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि धनवंतिर देव आयुर्वेद के जनक माने जाते हैं। धनवंतरि जयंती दोपहर से पूर्व ही मनाई जाती है। इस दिन धन के देवता कुबेर की भी पूजा होती है तथा धातु के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। यह पर्व घर में सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन किसी को उधार नहीं देना चाहिए और धन का अपव्यय नहीं करना चाहिए। सायंकाल मुख्य द्वार के दोनों ओर दीपदान करना चाहिए। यह दीपदान इस पर्व के पांचों दिन किया जाता है, इससे यमराज प्रसन्न रहते हैं और अकाल मृत्यु नहीं देते।
नरक चतुर्दशी: द्वितीय दिन 12 नवम्बर दिन सोमवार को नरक चतुर्दशी मनाई जाएगी। इस दिन सूर्योदय 6.35 बजे और त्रयोदशी तिथि का मान 4 दंड 59 पला अर्थात प्रात: 8.35 बजे तक है। इस कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी व रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर को मारकर समाज को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी। इस दिन उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। स्नान से पूर्व तिल्ली के तेल से शरीर की मालिश करनी चाहिए। क्योंकि इस दिन तेल में लक्ष्मी व जल में गंगा का निवास माना जाता है। स्नान के पश्चात यम को तर्पण किया जाता है। इस दिन हनुमान जयंती भी मनाई जाती है। दोपहर के समय हनुमानजी की पूजा-अर्चना की जाती है और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसलिए यह पर्व नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को छोटी दीपावली भी कहते हैं। इस दिन भी दीपदान किया जाता है। राजा बलि के राज्य के लिए दीप प्रज्वलित किया जाता है। इसी दिन राजा बलि का राज्य प्रारंभ हुआ था।
दीपावली: दीपों का पर्व दीपावली कार्तिक कृष्ण अमावस्या अर्थात 13 नवम्बर दिन मंगलवार को धूमधाम से मनाया जाएगा। इस दिन सूर्योदय 6.35 बजे और अमावस्या तिथि का मान 54 दंड 23 पला अर्थात रात्रि में 4.20 बजे तक है। स्वाती नक्षत्र भी दिन में 3.44 बजे तक है। दीपावली के दिन स्वाती नक्षत्र का योग उत्तम माना गया है। यह कमला जयंती का भी दिन है। इस त्योहार को मनाए जाने के कई कारण हैं। भगवान श्रीराम इसी दिन 14 वर्ष का वनवास भोगकर अपने राज्य में लौटे थे। इसलिए इस दिन दीप जलाकर खुशी मनाई जाती है। इस दिन मां लक्ष्मी का पूजन किया जाता है। दीपावली की रात्रि को महानिशा की संज्ञा दी गई है। इस दिन लक्ष्मी जी का स्वागत करने के लिए सभी तत्पर रहते हैं। लक्ष्मी पूजन के अतिरिक्त व्यापारिक स्थल की पूजा, तुला पूजा, बही-खाते का पूजन, लेखनी का पूजन, दवात का पूजन और कुबेर का पूजन किया जाता है। इस दिन गणेशजी, महाकाली व मां सरस्वती का भी पूजन किया जाता है।
गोवर्धन पूजा: कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा यानी 14 नवम्बर दिन बुधवार को अन्नकूट व गोवर्धन पूजा की जाएगी। श्रीकृष्ण के अवतार के पूर्व इस दिन इन्द्र देव की पूजा की जाती थी। परन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन गोवर्धन की पूजा प्रारंभ करवाई। इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत की रचना कर उसका पूजन किया जाता है। मंदिरों में अन्नकूट का आयोजन होता है। इस दिन गायों की सेवा का विशेष महत्व है।
भैया दूज: 15 नवम्बर दिन गुरुवार अर्थात कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को पांचवा पर्व भैया दूज मनाया जाएगा। इसे यमद्वितीया भी कहते हैं। इस दिन भाई अपनी बहन के घर जाकर भोजन करते हैं और श्रद्धानुसार भेंट प्रदान करते हैं। यम की बहन यमी के द्वारा इस दिन यम को बुलाकर भोजन करवाया गया था। यमी ने अपने भाई का अनेक प्रकार से स्वागत किया था। यम ने प्रसन्न होकर अनेक वस्तुएं बहन को अर्पित की थीं और वरदान मांगने को कहा था। यमी ने अपने भाई से वरदान मांगा कि जो बहन आज के दिन अपने भाई को भोजन करवाए तथा टीका करे, उसकी रक्षा होनी चाहिए। इसलिए इस त्योहार को यम द्वितीया कहा जाता है। इस दिन चित्रगुप्त का भी पूजन किया जाता है।

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