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दीपावली पर्व के साथ युग-युग का इतिहास जुड़ा है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण व भविष्य पुराण में इस पर्व से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित हैं। संकलन के आधार पर 16 कथाओं से संबंधित मान्यताओं के बारे में बता रहे हैं ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र।
प्रथम मान्यता के अनुसार वामनावतार में भगवान श्रीहरि ने राजा बलि को वरदान दिया था कि प्रतिवर्ष कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर कार्तिक कृष्ण अमावस्या तक उसका राज रहेगा और पृथ्वीवासी दीपोत्सव मनाते हुए दीपदान करेंगे। द्वितीय मान्यता के अनुसार एक पौराणिक कथा के अनुसार राम, सीता और लक्ष्मण इसी दिन लंका विजय के बाद 14 वर्ष का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने नगर को इस दिन दीपमालिकाओं से सजा दिया था। तभी से दीपावली मनाई जाने लगी।
तृतीय मान्यता के अनुसार दीपावली के संबंध में सर्वाधिक प्रचलित मान्यता है कि इस दिन समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ था। यह भी मान्यता है कि मां लक्ष्मी दीपावली की रात पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं तथा सजे-धजे व साफ-सुथरे घर में प्रवेश करती हैं। विष्णु धर्माेत्तर में ऐसा उल्लेख है।
चतुर्थ मान्यता के अनुसार पाण्डव अज्ञातवास समाप्त कर इसी दिन हस्तिनापुर लौटे थे। प्रजाजनों ने उनके स्वागत में दीपमालाएं जलाई थीं।
पंचम मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर 16 हजार 1 सौ राजकन्याओं को मुक्त करवाया था और दूसरे दिन अमावस्या को श्रीकृष्ण के अभिनंदन के लिए दीपमालाएं सजाई गई थीं।
छठीं मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला का संवरण कर इसी दिन गोलोक गमन किया था। सातवीं मान्यता के अनुसार जब प्रथम बार श्रीकृष्ण ग्वाल-बाल के साथ वन में गाय चराने गए थे तब उनके लौटने पर गोकुलवासियों ने दीपमालाएं सजाकर उनका स्वागत किया था। आठवीं मान्यता के अनुसार महाराजा पृथु ने इस दिन पृथ्वी का दोहन किया था जिससे भारतवर्ष धन-धान्य से परिपूर्ण हुआ था। फलस्वरूप इस दिन प्रजाजनों ने प्रसन्नता में दीपोत्सव किया था। नवीं मान्यता के अनुसार सम्राट अशोक ने विश्व विजय अभियान इसी दिन शुरू किया था। इस खुशी में प्रजाजनों ने दीपोत्सव का आयोजन किया था। दसवीं मान्यता के अनुसार इस दिन सम्राट विक्रमादित्य के राज्याभिषेक और उनके विजय के उपलक्ष्य में प्रजाजनों ने दीपदान किया था। ग्यारहवीं मान्यता के अनुसार गौतम बुद्ध जब 17 वर्ष के बाद कपिलवस्तु लौटे तब उनके स्वागत में अनुयायियों ने दीपों से नगर को सजा दिया था। इसी दिन गौतम बुद्ध ने अप्प दीपो भव की शिक्षा दी थी। बारहवीं मान्यता के अनुसार जैनधर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने इसी दिन निर्वाण को प्राप्त किया था। बारहवीं मान्यता के अनुसार जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने इसी दिन निर्वाण को प्राप्त किया था। इसलिए महावीर निर्वाण सम्वत कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। प्राचीन जैन ग्रंथ ‘कल्प सूत्र’ में लिखा है कि महावीर स्वामी के निर्वाण से अन्तर्ज्योत्बिुझ गई, उसकी क्षतिपूर्ति के लिए लोगों ने दीपदान किया था और वह परंपरा का स्वरूप धारण कर लिया। तेरहवीं मान्यता के अनुसार राक्षसों का वध करने के लिए इसी दिन देवी ने महाकाली का रूप धारण किया था और शिवजी की छाती पर पैर पड़ने से वह शांत स्वरूप धारण कर लीं। उसी शांत रूप को महालंक्ष्मी मानकर पूजा-अर्चना शुरू हुई। चौदहवीं मान्यता के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने इसी दिन राजसूय यज्ञ प्रारंभ किया था और इस दिन रात्रि में दीपमालिकाएं जलाई गई थीं और हर्ष प्रगट किया गया था। सोलहवीं मान्यता के अनुसार स्वामी रामकृष्ण परमहंस को इसी दिन मां काली ने दर्शन दिया था। इसलिए इस दिन बंगाल में काली की पूजा भी होती है।

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