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अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे।
एक नूर ते सब जग उपजेआ कौन भले कौन मंदे।।
आज वैज्ञानिक करोड़ों डालर खर्च कर गार्ड पार्टिकल की खोज कर खुशियां हासिल कर रहे हैं। लेकिन गुरुनानक देव जी ने बहुत पहले कह दिया- एक नूर ते...। 12 वर्ष के बालक गुरुनानक के पिता ने उन्हें 20 रुपए देकर सौदा लाने को कहा तो बचपन में ही सच्चा सौदा कर उन्होंने साबित कर दिया कि - होनहार बिरवान के होत चिकने पात। अपनी अलौकिक वाणी द्वारा तर्क देकर लोगों को अंधविश्वास, भ्रमजाल आदि के कुप्रभावों के प्रति जागरूक करते हुए उन्होंने एक परमात्मा को मानने के लिए कहा। बांटकर खाना, धर्म की कमाई, परिश्रम करना, नाम का जाप और सबका भला मांगने आदि का उपदेश ही नहीं दिया बल्कि स्वयं अपने आचरण, गुरुवाणी विचार आदि से साबित किया। जाति-पांत को समाप्त कर, गरीब के कच्चे घर में लंगर कर उसमें से दूध और जमींदार के 56 प्रकार के व्यंजनों से खून दिर्शाया कि मेहनत की कमाई में बरकत तथा प्रेम है। मानव कल्याण के लिए उन्होंने अनेक दुर्गम स्थानों की यात्राएं की। मक्का, मदीना, चीन, लद्दाख आदि भी गए।
इनका जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तिलौंडा तलवंडी नामक गांव में (आधुनिक रायपुर) संवत 1527 में कार्तिकी पूर्णिमा (15 अप्रैल, 1469) को एक खत्रीकुल में हुआ था । इनके पिता का नाम कल्यानचंद या मेहता कालू और माता का नाम तृपता था । इनकी बहन का नाम नानकी था। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया।
बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे । पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा। 7-8 साल की उम्र में स्कूल छूट गया और सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। इनका विवाह सोलह वर्ष की अवस्था में गुरुदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्ष्मी से हुआ था । 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र हरीचंद्र का जन्म हुआ । चार वर्ष पीछे दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ । दोनों लड़कों के जन्म के उपरांत 1507 में नानक अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पड़े। ये चारो ओर घूमकर उपदेश करने लगे । 1521 तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य- मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। 1539 में कर्तारपुर में उनकी ज्योति दिव्य ज्योति में समा गई।
गुरुनानक देव सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्होंने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। संत साहित्य में नानक अकेले हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है। इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये है ।
डॉ. मिन्टी सिंह
पूर्व अध्यक्ष इनरह्वील क्लब
गोरखपुर

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  1. ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये है ।
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