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लेखक- संतोष गुप्ता
कर्बला की कहानी मनुष्य की संवेदना को झकझोर देती है। सत्य के पथिक पर जालिमों ने जो कहर ढाया उसकी याद हर मुहर्रम दे जाता है और आंखें आसुओं से नम हो जाती हैं। तपते रेगिस्तान में जालिमों ने सत्य के पथिकों को दो बूंद पानी भी नहीं पीने दिया, यहां तक कि छह माह के बच्चे पर भी जुल्म ढाया। फिर भी सत्य के पथिक इमाम हुसैन इस्लामी कानून के खिलाफ नहीं गए, जालिमों के मंसूबों के आगे झुके नहीं और सत्य पर अडिग रहे। इंसानियत के इतिहास में जुल्मी यजीद का यह कारनामा एक काला अध्याय माना जाता है।
लगभग चौदह सौ वर्ष पहले हजरत मुहम्मद साहब के नवासे हजरत ईमाम हुसैन जो मदीने में रह रहे थे उनको माबिया के बेटे यजीद ने अपने मदीना के गर्वनर वलीद को खत के द्वारा आदेश दिया कि ईमाम हुसैन से यजीद के नाम पर बैयत (हाथ पर हाथ देना अथवा धार्मिक अगुआ कबूल करना) ले लें। यजीद जबरदस्ती मुसलमानों का खलीफा बन गया था और अपनी दौलत व फौज की ताकत के आधार पर आम आवाम को पैसा देकर, डरा कर व दबाव बना कर बैयत ले रहा था। अर्थात सबसे मनवा रहा था कि यजीद तमाम मुस्लमानों का खलीफा है और मुस्लमानों के नबी हजरत मुहम्मद साहब का उत्तराधिकारी है। खलीफा मान लिये जाने से मुस्लमानों में यह मान लिया जाता था कि खलीफा अल्लाह का नुमाइंदा (प्रतिनिधि)है। वह जो भी कहता और करता है वह अल्लाह के हुक्म से कहता व करता है और उसकी करनी व कथनी पर सभी मुस्लमानों को जन्नत पाने के लिए चलना पड़ेगा।
यजीद के बारे में सभी इतिहासकार व मुसलमान यह मानते हैं कि यजीद लोगों पर काफी जुल्म ढ़ाता था उसके राज्य में औरतें भी महफूज नहीं थी और लोग उसके खिलाफ सर नहीं उठा सकते थे। यजीद ने ही मदीना के अपने गर्वनर वलीद को आदेश दिया था कि ईमाम हुसैन उसके नाम की बैयत ले और नहीं मानने पर उनका कत्ल कर दिया जाय।
सन 60 हिजरी में वलीद ने ईमाम हुसैन को अपने दारूल अमारा (खलीफा का महल) बुलाया। जिस पर ईमाम हुसैन अपने 18 बनी हाशिम जवानों के साथ रात ही के समय दारूल अमारा पहुंचे मगर ईमाम हुसैन अपने जवान भाई अब्बास, बेटे अली अकबर व अन्य को अमारा के बाहर रह कर अपनी तेज आवाज आने तक का इंतजार करने को कह दिये। अमारा के अन्दर वलीद अपने साथ मरवान और अन्य साथियों के साथ बैठा। ईमाम हुसैन को देख कर वलीद ने यजीद का खत दिखाया। जिसपर ईमाम हुसैन ने कहा कि यह बहुत ही अहम मामला है, एक रात दोनों लोग विचार कर लें । कल सुबह हम दरबार-ए-आम में अपना जबाब दे देंगे। वलीद इस बात के लिए तैयार हो गया लेकिन बगल में बैठे मरवान ने वलीद से कहा कि ईमाम हुसैन बैयत ले लें अथवा उनका कत्ल कर दिया जाय क्योंकि इससे बेहतर अवसर नहीं मिलेगा। जिसे सुन ईमाम हुसैन के साथ वाले भी आ गये मगर ईमाम हुसैन ने मना कर दिया। ईमाम हुसैन वापस मदीना आ गये और अपनी बहन को सारी बातें बताई और 28 रजब सन 60 हिजरी को नाना की मजार व मां की कब्र को सलाम करके मदीने की ओर चल दिये।
ईमाम हुसैन का छोटा काफिला मक्के की पाक जमीन पर ठहर गया लेकिन यजीद ने वहां काबा पर हाजियों के वेश में अपने लोगों को ईमाम हुसैन का कत्ल करने को कहा था। इसकी जानकारी मिलने पर ईमाम हुसैन अपने काफिले के साथ काबा से बाहर चले गये और हज की जगह उमरा ही किया।
कूफे के लोगों ने ईमाम हुसैन को खत भेजा कि वह हम लोगों को बचाने के लिए चले। उन्होंने खुद न आकर मुस्लिम को भेज दिया। कूफे के गर्वनर इब्नेज्याद ने मुस्लिम का कत्ल कर दिया। उधर ईमाम हुसैन कूफे की ओर कूच कर रहे थे मगर घटना की जानकारी मिलने के बाद वह कूफे नहीं जाकर कर्बला (इराक) रवाना हो गये। रास्ते में यजीद की फौज उन्हें रोक कर शाम (सीरिया) ले जाना चाही।
इतिहासकार मानते हैं कि रास्ता रोकने वाली फौज के सिपाही और उनके जानवर प्यासे थे जिस पर ईमाम हुसैन ने अपने साथियों को प्यासे को सैराब (इच्छा भर) पानी पिलाने को कह दिया। इसके बाद वह अपने 72 साथियों के साथ दो मुहर्रम सन 61 हिजरी के दिन कर्बला पहुंच गये और वहां अपनी खैमों (शिविर) को नहरेंफुरात के किनारे नसब (लगा) कर दिया। जिसकी जानकारी मिलने पर यजीद ने पीसरेसाद की अगुआई में बड़ी सेना चार मुहर्रम को भेज दिया। ईमाम हुसैन के खेमे में 4 मुहर्रम को ही अंतिम बार पानी आया था। पानी की कमी और फिर न मिलने की आंशका के चलते बड़ों को थोड़ा-थोड़ा और बच्चों को भरपूर पानी दिया जाता था। सातवीं मुहर्रम तक पानी पूरी तरह खत्म हो गया। इसके बाद प्यास से व्याकुल बच्चों की सदाएं खेमों से बाहर आती थीं जो किसी को भी रुला सकती थीं, आज भी उस घटना को सुनकर लोगों की आंखें भर जाती है। लेकिन यजीद की फौजों का दिल नहीं पसीजा। 9 मुहर्रम का दिन गुजर जाने के बाद रात को ईमाम हुसैन पर हमला बोल दिया गया।
10 मुहर्रम को नमाज-ए-सुबह के बाद यजीद की फौज ने तीरों की बौछार करनी शुरू कर दी। सुबह से दोपहर तक पहले हुसैन के दोस्तों ने फिर भाई अब्बास ने अपनी कुर्बानी दी। इसके बाद ईमाम हुसैन ने यजीद की सेनाओं को अपना सजरा बता दिया। जिस पर वह लोग उनका भी कत्ल कर दिये। ईमाम हुसैन के बीमार बेटे जनाब आबिद को बन्दी बना कर शमा ले गये। यह बात आम लोगों को पता चलने में लगभग एक साल 40 दिन लग गए। बात जब अवाम को पता चली तो यहतेजाज और विद्रोह होने लगा तो डरकर यजीद ने आबिद व उनके साथियों को रिहा कर दिया। इस तरह से इमामी फौज का लुटा हुआ काफिला रिहाई के बाद चंद दिन सीरिया में रहने के बाद कर्बला होते हुए मदीना पहुंचा।
(आल इंडिया शिया पोलीटिकल कान्फ्रेंस के उपाध्यक्ष मोहम्मद मेंहदी एडवोकेट से बातचीत पर आधारित)

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