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मोहर्रम का महीना इस्लामी साल का पहला महीना होता है। अल्लाह के नजदीक चार महीने ऐसे हैं जिनको अस्सो हुसम (रज्जब) का महीना कहा जाता है। जिसमें मोहर्रम भी शामिल है। गुरुवार को चांद दिख जाने से शुक्रवार को मोहर्रम की पहली तारीख हुई। मोहर्रम शुरू हो गया। प्रथम दस दिनों तक इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाएगा। मोहर्रम की दसवीं 25 नवम्बर को है।
शहर ए काजी गोरखपुर मुफ्ती मौलाना वलीउल्लाह ने बताया कि मोहर्रम का महीना इस्लाम मजहब के लिहाज से सबसे पहले आदमी आदम अलैहिस्सलाम इसी दिन पैदा हुये थे। जिसकी वजह से सारी दुनिया के इंसानों को आदमी कहा गया। अल्लाह ने इंसानियत की भलाई के लिए बहुत कुछ कार्य किया है। आदम को अल्लाह ने दसवीं तारीख को धरती पर उतारा था। ऐसे ही दुनिया के तीन बड़े मजहब को मानने वाले यहूदी, इसाई तथा मुस्लमान जिनको नबी मानते हैं उनका नाम इब्राहीम है। उनके जमाने में बादशाहे वफ्फ ने आग में जलाने का हुक्म दे दिया था। आग में डालने के बाद भी वह उसमें से सुरक्षित बाहर निकल गये। वह दिन भी मुहर्रम की दसवीं तारीख थी। इसी तरीके से यहूदियों के नबी मूसा अलैहिस्सलाम जब सारे यहूदियों को लेकर निकलते हैं तो आगे दरिया पड़ गया। जिसके बाद अल्लाह ने उस नील नदी में से पानी को किनारे करके रास्ता बना दिया। जिसके चलते इसराईल कुल बच गया। जबकि पीछा कर रहे बादशाह अपने सभी साथियों सहित डूब गया। वह भी मोहर्रम की दसवीं तारीख ही थी। हजारों वाकयात इस मोहर्रम के दस दिनों से जुड़े हुए हैं। इसी में एक वाकया कर्बला के मैदान का भी है। जिसको शिया हाजरात गम के तौर पर मानते हैं। इमाम हुसैन को बादशाह-ए- वक्फ ने धोखा देकर अपने को मानने पर मजबूर करना चाहा और इनसे जबरदस्ती जंग करके इनके सारे खानदान वालों को शहीद कर दिया। कर्बला में अच्छाई व बुराई के बीच जंग हुई थी। इमाम हुसैन बुराई के आगे झुके नहीं। आज दुनिया में जहां भी मुहर्रम होता है, वहां गम मनाया जाता है। मुहर्रम में मुसलमानों के यहां जो लोग मुहर्रम नहीं मनाते वे लोग भी गरीबों को खाना खिलाना, नमाज पढ़ना, खुदा की इबादत करना और 9-10 व 10-11 के रोजे रखने आदि बहुत से ऐसे कार्य होते हैं जो करते हैं। बहुत से घरों में नए कपड़े नहीं पहनते और शादी वगैरह नहीं होती लोगों को बुलाकर इस दिन दुआ भी पढ़वाया जाता है। इस दिन में खिचड़ा नाम का खाना बनाकर खिलाते हैं। जिसमें सात-आठ किस्म के अनाज और गोश्त होता है। कुछ लोग मलीदा बनाकर दुलदुल को खिलाने के बाद बांटते भी हैं।

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